नारायणपुर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया कमरछठ, माताओं ने संतान की लंबी उम्र के लिए रखा निर्जला व्रत

नारायणपुर जिले में बुधवार को लोक आस्था का पर्व कमरछठ, हलषष्ठी और खमरछठ श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया गया। माताओं ने संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखा। सगरी पूजन, कथा श्रवण और पारंपरिक प्रसाद की विशेष व्यवस्था रही।

Sep 2, 2026 - 16:19
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नारायणपुर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया कमरछठ, माताओं ने संतान की लंबी उम्र के लिए रखा निर्जला व्रत

UNITED NEWS OF ASIA. संतोष मजुमदार, नारायणपुर l जिले में बुधवार 2 सितंबर को लोक आस्था का महापर्व कमरछठ श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति से जुड़े इस पर्व को हलषष्ठी और खमरछठ के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर माताओं ने अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखा। नारायणपुर के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सुबह से ही कमरछठ की विशेष पूजा-अर्चना और सगरी पूजन का सिलसिला शुरू हो गया था। महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा कर पर्व की धार्मिक मान्यताओं को निभाया।

कमरछठ पर्व का संबंध भगवान बलराम से माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान बलराम का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था। इसी वजह से इस दिन भगवान बलराम की आराधना के साथ संतान की लंबी आयु और उनके सुखमय जीवन के लिए माताएं व्रत रखती हैं। नारायणपुर में भी इस पर्व को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। कई स्थानों पर महिलाओं ने समूह में एकत्र होकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और पर्व की कथा सुनी।

पर्व की शुरुआत में व्रती महिलाओं ने सुबह महुए की दातुन कर व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद मिट्टी से तैयार की गई सगरी यानी छोटे तालाब की पूजा की गई। सगरी में दूध, दही, फूल और बेलपत्र अर्पित किए गए। इसके साथ ही भगवान शिव-पार्वती और गणेश जी की पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार पूजा संपन्न कर अपने परिवार और बच्चों के सुखद भविष्य की कामना की। पूजा स्थलों पर महिलाओं की मौजूदगी से पूरे वातावरण में धार्मिक और पारंपरिक रंग दिखाई दिया।

कमरछठ पर्व की एक खास पहचान इसका पारंपरिक खान-पान भी है। मान्यता के अनुसार इस दिन हल से जुती हुई भूमि से प्राप्त अनाज या ऐसी चीजों का सेवन नहीं किया जाता, जिन्हें हल से खेती करके उगाया गया हो। इसके स्थान पर तालाब या प्राकृतिक स्थानों पर उगने वाले पसहर चावल का विशेष महत्व माना जाता है। छह प्रकार की भाजियों को काली मिर्च और पानी के साथ पकाकर पारंपरिक प्रसाद तैयार किया जाता है। इसके अलावा भैंस के दूध, दही और घी का भी इस पर्व में विशेष महत्व बताया जाता है। महिलाएं पूजा के बाद इन्हीं पारंपरिक खाद्य पदार्थों के माध्यम से पर्व की परंपरा निभाती हैं।

नारायणपुर के बाजारों में भी कमरछठ को लेकर दिनभर रौनक बनी रही। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री, फूल, बेलपत्र और पारंपरिक भाजियों की खरीदारी के लिए लोग बाजार पहुंचे। गांवों में भी महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना कर कथा का श्रवण किया। शाम के समय सूर्यास्त के बाद व्रती महिलाओं द्वारा पारंपरिक विधि के अनुसार व्रत का पारण किया जाएगा। कमरछठ के आयोजन ने नारायणपुर में छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा, धार्मिक आस्था और पारिवारिक भावनाओं को एक साथ जीवंत कर दिया।