मनेंद्रगढ़ वनमंडल में RTI की अनदेखी, कैशबुक देने से बच रहे अधिकारी

मनेंद्रगढ़ वनमंडल में सूचना का अधिकार (RTI) कानून की अनदेखी के आरोप सामने आए हैं, जहां अधिकारी कैशबुक और व्यय विवरण देने से बचते नजर आ रहे हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

Apr 10, 2026 - 19:09
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मनेंद्रगढ़ वनमंडल में RTI की अनदेखी, कैशबुक देने से बच रहे अधिकारी

UNITED NEWS OF ASIA. प्रदीप पाटकर।  मनेंद्रगढ़ वनमंडल में सूचना का अधिकार (RTI) कानून की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाए गए इस कानून का पालन कराने के बजाय, संबंधित अधिकारी ही इससे बचते नजर आ रहे हैं।

बहरासी, मनेंद्रगढ़ और बिहारपुर वन परिक्षेत्रों में पदस्थ जन सूचना अधिकारियों पर आरोप है कि वे रेगुलर मद और कैंपा मद से जुड़े खर्चों की जानकारी देने में टालमटोल कर रहे हैं। जब आवेदकों द्वारा कैशबुक और व्यय विवरण मांगा जाता है, तो अधिकारी इसे “व्यक्तिगत जानकारी” बताकर देने से इनकार कर देते हैं, जबकि नियमों के अनुसार यह सार्वजनिक सूचना की श्रेणी में आता है।

छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) और राज्य सूचना आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि सरकारी धन के उपयोग से संबंधित सभी दस्तावेज, जैसे कैशबुक और व्यय विवरण, सार्वजनिक जानकारी हैं और इन्हें देने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद अधिकारियों द्वारा जानकारी छिपाने का प्रयास पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

इस संबंध में स्थानीय आरटीआई कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि बार-बार आवेदन और अपील करने के बावजूद जानकारी नहीं मिल रही है। प्रथम अपील स्तर पर भी ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण आवेदकों को राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि आयोग में अपीलों की संख्या इतनी अधिक है कि एक मामले की सुनवाई में 2 से 3 साल तक का समय लग जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की लापरवाही पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो RTI कानून का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा। यह कानून शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए बनाया गया था, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका प्रभाव सीमित होता दिखाई दे रहा है।

सबसे चिंता की बात यह है कि जिले के उच्च अधिकारी भी इस मामले में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं। नियमों के अनुसार, जिला प्रशासन और विभागीय प्रमुखों को RTI मामलों की नियमित समीक्षा करनी चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, तो आम जनता का RTI कानून पर भरोसा कमजोर हो सकता है।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाता है। क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या फिर RTI कानून केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा—यह आने वाला समय ही बताएगा।