हंसपुर रामनरेश हत्याकांड में प्रशासनिक जांच पर उठे सवाल, तत्कालीन कलेक्टर की भूमिका चर्चा में
बलरामपुर जिले के बहुचर्चित हंसपुर रामनरेश हत्याकांड में अब तत्कालीन कलेक्टर द्वारा गठित प्रशासनिक जांच दल की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। पुलिस विवेचना के समानांतर जांच कराए जाने को लेकर स्थानीय स्तर पर विवाद गहराया हुआ है। मामले में 23 मार्च की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।
UNITED NEWS OF ASIA. अली खान बलरामपुर l जिले के कोरंधा थाना क्षेत्र के बहुचर्चित हंसपुर रामनरेश हत्याकांड में अब एक नया विवाद सामने आ गया है। मामला केवल हत्या और आरोपी अधिकारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा गठित प्रशासनिक जांच दल की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या पुलिस विवेचना के समानांतर प्रशासनिक जांच कर मूल जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई।
जानकारी के अनुसार कार्यालय कलेक्टर बलरामपुर-रामानुजगंज द्वारा 17 फरवरी 2026 को आदेश जारी कर एक जांच दल गठित किया गया था। आरोप है कि इस जांच दल ने उन्हीं गवाहों और व्यक्तियों के बयान दर्ज किए, जिनके बयान पहले ही पुलिस विवेचना में शामिल किए जा चुके थे। इसे लेकर अब निष्पक्ष जांच और न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
विवाद का एक बड़ा कारण यह भी है कि तहसील कार्यालय कुसमी के माध्यम से कुछ व्यक्तियों को बयान के लिए बुलाया गया, जबकि वे पहले ही पुलिस के समक्ष बयान दे चुके थे। स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि जिन कार्यालयों में बयान दर्ज किए गए, वहां आरोपी और निलंबित तत्कालीन एसडीएम करुण डहरिया पहले पदस्थ रह चुके थे। इसके अलावा वर्तमान एसडीएम अनमोल विवेक टोप्पो को जांच दल में शामिल किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों और कानूनी जानकारों का कहना है कि जिले में पहले भी कई शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हुए, लेकिन उन मामलों में कभी भी कलेक्टर स्तर पर समानांतर प्रशासनिक जांच नहीं कराई गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इस मामले में विशेष जांच दल गठित करने की जरूरत क्यों पड़ी।
मामले में यह भी चर्चा है कि यदि भविष्य में हर आपराधिक मामले में, जहां कोई सरकारी अधिकारी आरोपी हो, इस प्रकार की समानांतर जांच शुरू हो जाए, तो इससे पुलिस विवेचना और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आपराधिक मामलों की जांच का अधिकार पुलिस और संबंधित जांच एजेंसियों के पास होता है, ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर अलग से तथ्यात्मक जांच कई कानूनी प्रश्न खड़े करती है।
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि क्या जिला प्रशासन को हत्या जैसे गंभीर आपराधिक मामले में समानांतर जांच कराने का अधिकार है। लोगों का कहना है कि यदि पुलिस पहले से विवेचना कर रही थी, तो फिर प्रशासनिक स्तर पर गवाहों के बयान दोबारा दर्ज कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
मामले में अब 23 मार्च को होने वाली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा है कि न्यायालय इस पूरे घटनाक्रम पर क्या रुख अपनाता है और क्या प्रशासनिक जांच दल की भूमिका को लेकर कोई नई कार्रवाई या एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए जाते हैं।
इस बीच सनावल क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन से जुड़े मामले का उदाहरण देते हुए लोग प्रशासन के दोहरे रवैये पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अन्य मामलों में प्रशासनिक जांच नहीं कराई गई, लेकिन हंसपुर मामले में विशेष जांच दल गठित होने से कई नए संदेह पैदा हो रहे हैं। फिलहाल पूरे मामले को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं।