राज्योत्सव के प्रथम दिवस पद्मश्री डॉ. भारती बंधु की सुफी प्रस्तुति से झूम उठा कवर्धा, गजल और लोकधुनों ने बांधा समा

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के पहले दिन कवर्धा में पद्मश्री डॉ. भारती बंधु की सुफी और लोकगीतों से सजी प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। “धीरे हाको राम गाड़ी वाला” और “छाप तिलक सब छीने रे” जैसी गजलों ने माहौल को भावनात्मक बना दिया। हजारों दर्शकों ने तालियों की गूंज से कलाकार का अभिनंदन किया।

Nov 3, 2025 - 17:48
 0  7
राज्योत्सव के प्रथम दिवस पद्मश्री डॉ. भारती बंधु की सुफी प्रस्तुति से झूम उठा कवर्धा, गजल और लोकधुनों ने बांधा समा

UNITED NEWS OF ASIA. कवर्धा। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2025 के प्रथम दिवस पर कवर्धा ने एक अद्भुत सांस्कृतिक संध्या का साक्षी बना, जब पद्मश्री डॉ. भारती बंधु ने अपनी सुमधुर आवाज में सुफी और लोक संगीत की झंकार से पूरा मैदान गुंजा दिया।
आचार्य पंथ श्री गृथमुनि नाम साहेब शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में दर्शकगण उपस्थित रहे, जिन्होंने हर गीत के साथ तालियां बजाकर कलाकार का उत्साह बढ़ाया।

 

डॉ. भारती बंधु ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत भक्ति और लोकभावना से ओतप्रोत गीत “धीरे हाको राम गाड़ी वाला” से की, जिसने वातावरण को आध्यात्मिकता और लोकस्वर से भर दिया। इसके बाद जब उन्होंने मशहूर सुफी गजल “छाप तिलक सब छीने रे मौसे नैना मिलई के” गाई, तो दर्शक मंत्रमुग्ध होकर झूम उठे।
उनकी आवाज में भक्ति, प्रेम और मानवीय संवेदना का ऐसा संगम देखने मिला कि पूरा मैदान एक स्वर में गुनगुनाने लगा।

राज्योत्सव के इस पहले दिन मंच पर छत्तीसगढ़ की माटी की सुगंध, लोककला की झलक और संगीत की आत्मा एक साथ महसूस हुई। डॉ. भारती बंधु की प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि छत्तीसगढ़ का संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा को छू लेने वाली साधना है।

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों, जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ नागरिकों ने कलाकार की सराहना करते हुए उन्हें छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का सच्चा प्रतीक बताया।
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच भारती बंधु ने दर्शकों के अनुरोध पर कुछ अतिरिक्त गीत भी प्रस्तुत किए, जिनमें भक्ति और सुफी रस का अनोखा संगम देखने मिला।

कार्यक्रम स्थल को राज्योत्सव थीम पर आकर्षक ढंग से सजाया गया था। लोक कला प्रदर्शनी, हस्तशिल्प स्टॉल और प्रकाश व्यवस्था ने पूरे परिसर को उत्सवमय बना दिया।
संध्या का समापन “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” के जयघोष और रंगारंग आतिशबाजी के साथ हुआ, जिसने दर्शकों के मन में गर्व और उल्लास की लहर दौड़ा दी।

यह राज्योत्सव संध्या न केवल मनोरंजन का अवसर बनी, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा, संगीत और संवेदना का जीवंत प्रदर्शन भी रही।