मरीज पूर्ण हृदय अवरोध (Complete Heart Block) से पीड़ित थीं। इस स्थिति में हृदय की विद्युत गतिविधि प्रभावित होने के कारण धड़कनों की गति असामान्य रूप से कम हो सकती है, जिसे ब्रैडीकार्डिया कहा जाता है। ऐसे मामलों में हृदय की धड़कन को नियंत्रित और सामान्य बनाए रखने के लिए स्थायी पेसमेकर की आवश्यकता पड़ सकती है। मरीज की शिराओं की बनावट सामान्य से अलग होने के कारण पेसमेकर की लीड को हृदय के निर्धारित हिस्से तक पहुंचाना चिकित्सकीय रूप से चुनौतीपूर्ण था।
PLSVC एक जन्मजात शारीरिक स्थिति है, जिसमें शरीर के ऊपरी हिस्से से रक्त को हृदय तक पहुंचाने वाली बाईं ओर की सुपीरियर वेना कावा जन्म के बाद भी बनी रहती है। सामान्य भ्रूणीय विकास के दौरान यह संरचना धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है, लेकिन कुछ लोगों में यह बनी रहती है। अधिकांश मामलों में PLSVC से व्यक्ति को कोई विशेष परेशानी नहीं होती और हृदय की कार्यप्रणाली सामान्य रहती है। कई बार इसका पता किसी अन्य जांच या हृदय संबंधी प्रक्रिया के दौरान संयोग से चलता है। हालांकि, पेसमेकर जैसी प्रक्रियाओं में इसकी अलग शिरापरक संरचना तकनीकी चुनौती पैदा कर सकती है।
सामान्य स्थिति में पेसमेकर की लीड सुपीरियर वेना कावा के रास्ते राइट एट्रियम और फिर राइट वेंट्रिकल तक पहुंचाई जाती है। PLSVC की स्थिति में लीड को अलग मार्ग से होकर कोरोनरी साइनस के रास्ते राइट एट्रियम तक पहुंचाना पड़ता है। इसके बाद ट्राइकस्पिड वाल्व को पार कर लीड को राइट वेंट्रिकल में उचित स्थान पर स्थापित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी कठिनाई को देखते हुए चिकित्सकीय टीम ने अल्फा लूप तकनीक का उपयोग किया।
अल्फा लूप तकनीक में पेसमेकर लीड को राइट एट्रियम के भीतर विशेष तरीके से घुमाकर एक लूप बनाया जाता है, जो ग्रीक अक्षर अल्फा जैसा दिखाई देता है। इस विशेष विन्यास से लीड को उचित दिशा में आगे बढ़ाने और आवश्यक स्लैक के साथ राइट वेंट्रिकल तक पहुंचाने में सहायता मिलती है। विशेषज्ञ टीम ने मरीज की शिरापरक संरचना को ध्यान में रखते हुए इस तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया और इसके बाद डुअल चैंबर पेसमेकर लगाया गया।
प्रक्रिया के बाद पेसमेकर की लीड की स्थिति और कार्यप्रणाली संतोषजनक रही तथा मरीज की स्थिति स्थिर बताई गई। यह पूरी प्रक्रिया डॉ. स्मित श्रीवास्तव के नेतृत्व में संपन्न हुई। टीम में डॉ. इनायत रिजवी, डॉ. वासु कन्नौज और डॉ. मसूद शामिल रहे। तकनीकी सहयोग टेक्नीशियन नवीन और जितेंद्र ने दिया, जबकि नर्सिंग स्टाफ बुद्धेश्वर, रोशनी और आशा ने मरीज की देखभाल में सहयोग किया।
मरीज का उपचार आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत किया गया। एसीआई में इस चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया की सफलता रायपुर में उन्नत हृदय संबंधी उपचार सुविधाओं के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।