यह मामला दंतेवाड़ा जिला का है, जहां एनएमडीसी टाउनशिप से निकलने वाला गंदा पानी पहले बचेली सिंम्प्लेक्स नाले में और उसके बाद पुराना मार्केट क्षेत्र के नाले में मिलाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि खदान क्षेत्र के प्रभाव से पहले ही पानी का रंग लाल हो चुका है और अब घरेलू व सीवर मिश्रित जल के कारण स्थिति और अधिक गंभीर होती जा रही है।
ग्रामीणों के अनुसार, यही दूषित पानी आगे नेरली, बड़े बचेली सहित आसपास के कई गांवों तक पहुंच रहा है। इन गांवों के कई परिवार इसी नाले के पानी का उपयोग कपड़े धोने, नहाने और अन्य घरेलू कार्यों में कर रहे हैं। इसके साथ ही गाय, बैल और बकरियों जैसे मवेशी भी इसी पानी को पीने के लिए मजबूर हैं। लोगों को आशंका है कि आने वाले दिनों में पशुओं के बीमार पड़ने और दुग्ध उत्पादन पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है।
स्थानीय नागरिकों ने यह भी बताया कि टाउनशिप क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं और यहां एनएमडीसी अपोलो हॉस्पिटल, बचेली का संचालन भी किया जा रहा है। ऐसे में अस्पताल और टाउनशिप से निकलने वाले अपशिष्ट जल का वैज्ञानिक तरीके से शोधन किया जाना बेहद आवश्यक है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब एनएमडीसी जैसी बड़ी खनन कंपनी करोड़ों-अरबों रुपये का कारोबार करती है, तो एक आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करना क्या उसके लिए संभव नहीं है?
पर्यावरण जानकारों का कहना है कि बिना शोधन के घरेलू और सीवर अपशिष्ट जल को खुले नालों में छोड़ना जल स्रोतों को गंभीर रूप से प्रदूषित करता है। इससे डायरिया, त्वचा रोग, पेट से जुड़ी बीमारियां और अन्य संक्रमण तेजी से फैल सकते हैं। विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति अधिक खतरनाक मानी जा रही है।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि बारिश के मौसम में यही गंदा पानी आसपास के खेतों और निचले इलाकों में फैल जाता है, जिससे मिट्टी और फसलों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है। लंबे समय से इस समस्या को लेकर मौखिक शिकायतें की जा रही हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और टाउनशिप क्षेत्र में तत्काल फिल्टर प्लांट अथवा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना सुनिश्चित की जाए, ताकि नालों में छोड़ा जाने वाला पानी शुद्ध होकर ही बाहर प्रवाहित हो। साथ ही प्रभावित गांवों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था भी की जाए।
यह मामला केवल बचेली तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में औद्योगिक और टाउनशिप क्षेत्रों से निकलने वाले निस्तार जल प्रबंधन पर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार विभाग इस गंभीर समस्या पर कितनी शीघ्रता से संज्ञान लेते हैं और ग्रामीणों को वास्तविक राहत मिल पाती है या नहीं।