‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026’ से सम्मानित हुआ लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर
जब समाज का प्रत्येक नागरिक एक पौधे को केवल हरियाली नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का संकल्प मानकर रोपित करता है, तब पर्यावरण संरक्षण एक अभियान नहीं, बल्कि जनआंदोलन बन जाता है। यही जनआंदोलन किसी क्षेत्र की पहचान बदलने और उसे राष्ट्रीय सम्मान दिलाने की क्षमता रखता है।"
UNITED NEWS OF ASIA. संतोष मजुमदा, नारायणपुर l छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का नारायणपुर जिला तथा उसका अबूझमाड़ क्षेत्र लंबे समय तक देश के सबसे दुर्गम, भौगोलिक दृष्टि से कठिन तथा पूर्व में घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। घने वन, ऊँची-नीची पहाड़ियाँ, सीमित संचार सुविधाएँ, कठिन आवागमन, दूरस्थ आदिवासी बस्तियाँ तथा विकास की मुख्यधारा से वर्षों तक दूरी—ये सभी इस क्षेत्र की प्रमुख पहचान रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद उनका वैज्ञानिक एवं सतत उपयोग सीमित था। अनेक गाँवों में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि तथा प्राकृतिक संसाधनों के समुचित प्रबंधन के प्रति व्यापक जनजागरूकता का अभाव था।
जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूमि क्षरण, घटते हरित आवरण, सीमित सिंचाई सुविधाएँ तथा पारंपरिक कृषि पर बढ़ता दबाव ग्रामीण जीवन के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे थे। अनेक स्थानों पर गर्मियों के दौरान जल संकट गहरा जाता था, जबकि कृषि उत्पादन भी प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर था। पर्यावरण संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका था।
ऐसी परिस्थितियों में पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित रखकर स्थायी परिवर्तन लाना संभव नहीं था।आवश्यकता थी ऐसे मॉडल की, जो समाज के प्रत्येक वर्ग को जोड़ सके, स्थानीय समुदायों में स्वामित्व की भावना विकसित करे और पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी के माध्यम से एक सामाजिक आंदोलन का रूप दे। इसी सोच ने लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर में एक ऐसे व्यापक अभियान की नींव रखी, जिसने शिक्षा, विज्ञान, स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक सहभागिता और सतत विकास को एक सूत्र में पिरोते हुए पूरे क्षेत्र में हरित परिवर्तन की नई शुरुआत की।
यहीं से प्रारंभ हुई वह प्रेरक यात्रा, जिसने आगे चलकर नारायणपुर और अबूझमाड़ को पर्यावरण संरक्षण, जनभागीदारी, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान दिलाई तथा जल शक्ति मंत्रालय के 'नमामि गंगे' कार्यक्रम के अंतर्गत 'पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026' जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान तक पहुँचाया।
राष्ट्रीय सम्मान के बाद सामाजिक परिवर्तन जनआंदोलन बना जनविश्वास की पहचान
वर्ष 2026 में जल शक्ति मंत्रालय के 'नमामि गंगे' कार्यक्रम के अंतर्गत 'पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026' प्राप्त होने के बाद इस अभियान ने एक नया अध्याय प्रारंभ किया। यह सम्मान केवल लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर की उपलब्धि नहीं था, बल्कि पूरे नारायणपुर, अबूझमाड़ और छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय बन गया। राष्ट्रीय स्तर पर मिली इस प्रतिष्ठित पहचान ने लोगों के भीतर आत्मविश्वास, गर्व और पर्यावरण संरक्षण के प्रति नई ऊर्जा का संचार किया। जो अभियान अब तक महाविद्यालय और उसके स्वयंसेवकों के नेतृत्व में संचालित हो रहा था, वह धीरे-धीरे समाज के प्रत्येक वर्ग का अपना अभियान बन गया।
ग्रामीण स्वयं पौधे लेने आने लगे
राष्ट्रीय सम्मान के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन लोगों की सोच और व्यवहार में दिखाई दिया। पहले जहाँ पौधारोपण कार्यक्रमों के लिए लोगों को प्रेरित करना पड़ता था, वहीं अब ग्रामीण स्वयं महाविद्यालय पहुँचकर पौधे प्राप्त करने लगे। किसानों, युवाओं, महिलाओं, विद्यार्थियों तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों ने स्वप्रेरणा से अपने गाँवों, खेतों, विद्यालय परिसरों, आंगनबाड़ी केन्द्रों, देवस्थलों, सार्वजनिक स्थलों तथा सड़क किनारों पर वृक्षारोपण प्रारंभ किया।
पौधे लेना केवल एक औपचारिकता नहीं रह गई, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह अपनाने लगा। अनेक ग्रामीणों ने एक पौधा अपने बच्चों के जन्म, विवाह, स्मृति दिवस तथा अन्य सामाजिक अवसरों पर लगाने की परंपरा प्रारंभ की। धीरे-धीरे वृक्षारोपण सामाजिक संस्कार का रूप लेने लगा।
ग्राम पंचायतों की बढ़ी सक्रिय भागीदारी
राष्ट्रीय सम्मान के बाद ग्राम पंचायतों ने भी पर्यावरण संरक्षण को ग्राम विकास की प्राथमिकताओं में शामिल करना प्रारंभ किया। कई पंचायतों ने सामूहिक वृक्षारोपण अभियान आयोजित किए, ग्राम स्तर पर पौधों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारियाँ निर्धारित कीं तथा सार्वजनिक स्थलों को हरित बनाने का संकल्प लिया।
ग्राम सभाओं में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, स्वच्छता, प्राकृतिक खेती तथा जैव विविधता संरक्षण जैसे विषय नियमित चर्चा का हिस्सा बनने लगे। पंचायत प्रतिनिधियों, जनप्रतिनिधियों तथा स्थानीय नेतृत्व ने भी इस अभियान को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई। इससे पर्यावरण संरक्षण सरकारी कार्यक्रम न रहकर स्थानीय स्वशासन और सामुदायिक विकास का अभिन्न अंग बन गया।
जनआंदोलन का हुआ व्यापक विस्तार
'पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार–2026' ने इस अभियान को नई पहचान और विश्वसनीयता प्रदान की। परिणामस्वरूप इसकी पहुँच महाविद्यालय परिसर से निकलकर दूरस्थ आदिवासी गाँवों तक फैल गई। राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों, विद्यार्थियों, किसानों, महिला स्व-सहायता समूहों, विद्यालयों, युवाओं तथा सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने स्तर पर हरित अभियान प्रारंभ किए। वृक्षारोपण के साथ-साथ सीड बॉल वितरण, वर्षा जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त परिसर, स्वच्छता अभियान, पोषण वाटिका, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, जैव विविधता संरक्षण तथा पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रमों का भी व्यापक विस्तार हुआ। कई स्थानों पर लोगों ने स्वयं श्रमदान कर सार्वजनिक भूमि पर हरित क्षेत्र विकसित किए। पर्यावरण संरक्षण अब किसी संस्था का कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन गया।
व्यवहार परिवर्तन के प्रेरक उदाहरण
इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता आँकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के व्यवहार में आए परिवर्तन में दिखाई दी। जहाँ पहले पौधे लगाकर उनकी देखभाल पर कम ध्यान दिया जाता था, वहीं अब लोग स्वयं पौधों की सुरक्षा, सिंचाई, ट्री-गार्ड लगाने तथा नियमित निगरानी का दायित्व निभाने लगे। अनेक गाँवों में बच्चों और युवाओं ने "एक व्यक्ति–एक पौधा" तथा "एक परिवार–एक हरित वाटिका" जैसे संकल्प अपनाए।
किसानों ने प्राकृतिक एवं जैविक खेती को अपनाकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में पहल की। महिलाओं ने अपने घरों में पोषण वाटिकाएँ विकसित कर परिवारों को पौष्टिक एवं रसायनमुक्त सब्जियाँ उपलब्ध करानी प्रारंभ कीं। विद्यालयों में विद्यार्थियों ने पर्यावरण शपथ, स्वच्छता अभियान, हरित परिसर तथा प्रकृति संरक्षण की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेना शुरू किया।
राष्ट्रीय सम्मान के बाद यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया गया कि लोगों ने पर्यावरण संरक्षण को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मान लिया है। वृक्षों की सुरक्षा सामाजिक दायित्व बन गई, जल संरक्षण जनचेतना का विषय बन गया और हरित विकास सामूहिक लक्ष्य के रूप में स्थापित हुआ। यही स्थायी व्यवहार परिवर्तन इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यही कारण है कि लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर द्वारा प्रारंभ किया गया यह प्रयास आज केवल एक सफल परियोजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी आधारित पर्यावरण संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल बनकर उभरा है, जो यह संदेश देता है कि जब समाज स्वयं परिवर्तन का नेतृत्व करता है, तब विकास स्थायी, समावेशी और पीढ़ियों तक प्रभाव छोड़ने वाला बन जाता है।
हरित अभियान का विस्तार
जनभागीदारी से साकार हुआ हरित परिवर्तन का मॉडल लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर द्वारा प्रारंभ किया गया पर्यावरण संरक्षण अभियान केवल औपचारिक वृक्षारोपण कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। यह एक सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक, सहभागी एवं दीर्घकालिक हरित विकास मॉडल के रूप में विकसित हुआ, जिसमें वृक्षारोपण, पौध संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन, सीड बॉल अभियान तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को एकीकृत रूप से अपनाया गया। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें केवल पौधे लगाने पर नहीं, बल्कि उन्हें जीवित रखने, विकसित करने और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बनाने पर विशेष बल दिया गया। यही कारण है कि यह अभियान आज पूरे क्षेत्र में हरित परिवर्तन की मिसाल बन चुका है।
36,421 पौधों ने लिखी हरियाली की नई कहानी
अभियान के अंतर्गत विभिन्न चरणों में 36,421 पौधों का रोपण किया गया। यह संख्या केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति समाज की सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक बन गई। वृक्षारोपण कार्य को विद्यालय परिसरों, महाविद्यालय परिसर, ग्राम पंचायतों, कृषि क्षेत्रों, सड़क किनारों, सार्वजनिक स्थलों, जल स्रोतों के आसपास, देवस्थलों तथा आदिवासी गाँवों में योजनाबद्ध ढंग से संचालित किया गया। स्थानीय जलवायु और पारिस्थितिकी के अनुरूप विभिन्न प्रजातियों के पौधों का चयन किया गया, जिससे उनकी जीवित रहने की संभावना अधिक रहे और क्षेत्र की जैव विविधता भी समृद्ध हो। प्रत्येक पौधे को भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक प्राकृतिक धरोहर मानते हुए रोपित किया गया। इस अभियान ने न केवल हरित आवरण में वृद्धि की, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में भावनात्मक जुड़ाव भी विकसित किया।
पौधों के संरक्षण का बना अनुकरणीय मॉडल
इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता केवल पौधे लगाने में नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने और विकसित करने में रही। सामान्यतः अनेक वृक्षारोपण कार्यक्रम पौधे लगाने के बाद समाप्त हो जाते हैं, किन्तु यहाँ प्रत्येक पौधे को एक जिम्मेदारी के रूप में अपनाया गया। राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों, विद्यार्थियों, किसानों, महिला स्व-सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों तथा स्थानीय ग्रामीणों ने पौधों की नियमित सिंचाई, सुरक्षा, निराई-गुड़ाई, जैविक खाद का उपयोग तथा आवश्यक संरक्षण की जिम्मेदारी स्वयं निभाई। अनेक स्थानों पर पौधों के चारों ओर सुरक्षा घेरा (ट्री गार्ड) लगाया गया तथा समय-समय पर उनकी निगरानी की गई।
महाविद्यालय द्वारा नियमित निरीक्षण, पौधों की प्रगति का मूल्यांकन तथा सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि लगाए गए पौधे स्वस्थ रूप से विकसित हों। यही कारण रहा कि हजारों पौधे आज विकसित वृक्ष बनकर क्षेत्र की हरियाली, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को सुदृढ़ कर रहे हैं। इस संरक्षण मॉडल ने यह सिद्ध किया कि वृक्षारोपण तभी सफल माना जा सकता है जब पौधे जीवित रहकर समाज को दीर्घकालिक लाभ प्रदान करें।
48,000 से अधिक सीड बॉल्स से हरित हुआ दुर्गम वनांचल
अबूझमाड़ जैसे दुर्गम और वनाच्छादित क्षेत्रों में अनेक स्थान ऐसे थे जहाँ पारंपरिक तरीके से पौधारोपण करना संभव नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में महाविद्यालय ने पर्यावरण संरक्षण का एक अभिनव और वैज्ञानिक समाधान अपनाते हुए 48,000 से अधिक सीड बॉल्स तैयार किए। इन सीड बॉल्स में स्थानीय प्रजातियों के बीजों को मिट्टी, गोबर तथा जैविक पदार्थों के मिश्रण से सुरक्षित किया गया, ताकि वर्षा ऋतु में वे स्वाभाविक रूप से अंकुरित होकर नए पौधों का रूप ले सकें। राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों, विद्यार्थियों, ग्रामीण युवाओं तथा स्थानीय समुदायों ने वर्षा ऋतु के दौरान कठिन पहाड़ी क्षेत्रों, वनभूमि तथा बंजर स्थलों तक पहुँचकर इन सीड बॉल्स का व्यापक प्रसारण किया।
यह पहल केवल हरित आवरण बढ़ाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्राकृतिक पुनर्जीवन का प्रभावी मॉडल बनकर उभरी। इस नवाचार ने ऐसे क्षेत्रों में भी हरियाली बढ़ाने की संभावना उत्पन्न की जहाँ मानव हस्तक्षेप सीमित था। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यह पहल जनभागीदारी, वैज्ञानिक सोच और स्थानीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण बनी।
जैव विविधता संरक्षण की दिशा में प्रभावी पहल
हरित अभियान का उद्देश्य केवल वृक्षों की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना था। इसी उद्देश्य से स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण को अभियान का अभिन्न अंग बनाया गया। स्थानीय वृक्ष प्रजातियों के संरक्षण, प्राकृतिक वनस्पतियों के संवर्धन, पक्षियों एवं अन्य जीव-जंतुओं के अनुकूल वातावरण के निर्माण तथा पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास किए गए। वृक्षारोपण, सीड बॉल अभियान और प्राकृतिक पुनर्जीवन के कारण अनेक क्षेत्रों में हरित आवरण बढ़ा, जिससे मिट्टी संरक्षण, जल धारण क्षमता, सूक्ष्म जलवायु तथा जैव विविधता पर सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगे।
पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों, किसानों और ग्रामीणों को यह समझाया गया कि प्रत्येक वृक्ष केवल ऑक्सीजन का स्रोत नहीं, बल्कि असंख्य जीवों का आश्रय, जल संरक्षण का आधार, मिट्टी की उर्वरता का संरक्षक और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने का प्राकृतिक साधन है। परिणामस्वरूप लोगों में जैव विविधता संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित हुई। आज यह हरित अभियान केवल लगाए गए 36,421 पौधों और 48,000 से अधिक सीड बॉल्स तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि वैज्ञानिक योजना, जनभागीदारी, स्थानीय नेतृत्व और सतत प्रयास एक साथ कार्य करें, तो सबसे दुर्गम क्षेत्र भी हरित विकास और पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय मॉडल बन सकते हैं। यही इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही इसकी स्थायी विरासत भी।