कोरबा में वन्यजीव प्यासे: मड़वारानी जंगल में जल योजना फेल, दो साल में नहीं पहुंची पानी की बूंद

कोरबा जिले के मड़वारानी जंगल में वन्य प्राणियों के लिए बनाई गई जल योजना दो साल बाद भी धरातल पर सफल नहीं हो पाई है। करोड़ों की योजनाओं के बावजूद जंगल में पानी नहीं पहुंच रहा, जिससे जानवर गांवों की ओर भटक रहे हैं और उनकी जान खतरे में पड़ रही है।

Apr 19, 2026 - 11:50
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कोरबा में वन्यजीव प्यासे: मड़वारानी जंगल में जल योजना फेल, दो साल में नहीं पहुंची पानी की बूंद

UNITED NEWS OF ASIA. राहुल गुप्ता l कोरबा, छत्तीसगढ़ — जिले के मड़वारानी-खरहरी जंगल क्षेत्र में वन्य प्राणियों के लिए पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करने की योजनाएं कागजों तक ही सीमित नजर आ रही हैं। वन विभाग द्वारा लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद स्थिति यह है कि पिछले दो वर्षों में यहां वन्य जीवों को पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो पाई है। इससे जंगल में रहने वाले हिरण, चीतल और अन्य वन्य प्राणी प्यास से व्याकुल होकर रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उनकी जान पर खतरा मंडरा रहा है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, वन विभाग ने पूर्व में इस क्षेत्र में एक डैम का निर्माण कराया था, लेकिन गर्मी के मौसम में उसमें पानी का एक बूंद भी नहीं रहता। पानी के अभाव में वन्य प्राणी मजबूर होकर गांवों की ओर जाते हैं, जहां उन्हें आवारा कुत्तों और अन्य खतरों का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में चीतल और हिरण जैसे जानवरों की मौत भी हो चुकी है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

वन्य प्राणियों की इस समस्या को देखते हुए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा एक नई परियोजना को स्वीकृति दी गई थी। इस योजना के तहत ग्राम पंचायत पुरैना के अंतर्गत आने वाले मड़वारानी जंगल क्षेत्र में बोर खनन, पानी सप्लाई, सासर पिट और वाटर टैंक निर्माण जैसे कार्य प्रस्तावित किए गए थे। यह परियोजना 2024-25 के लिए स्वीकृत की गई थी और इसका उद्देश्य जंगल के भीतर ही पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना था, ताकि वन्य जीवों को बाहर भटकना न पड़े।

वन प्रबंधन समिति पुरैना की बैठक 2 जुलाई 2024 को आयोजित की गई थी, जिसमें इस योजना को लागू करने की सहमति दी गई। बैठक में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि पानी की कमी के कारण चीतल और अन्य जानवर जंगल से बाहर निकलकर गांवों में प्रवेश कर रहे हैं और उनका शिकार हो रहा है। इसके बावजूद, योजना का क्रियान्वयन अधूरा ही रह गया और आज तक इसका लाभ जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा है।

स्थिति यह है कि दो साल बीत जाने के बावजूद न तो बोरिंग का काम पूरी तरह हुआ है और न ही पानी की नियमित सप्लाई सुनिश्चित की जा सकी है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इस योजना पर खर्च की गई राशि कहां गई और इसका लाभ वन्य प्राणियों तक क्यों नहीं पहुंच पाया।

इस मामले में वन विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। डीएफओ, एसडीओ, रेंजर और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता साफ नजर आ रही है। वहीं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी इस समस्या को और गंभीर बना रही है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि योजनाओं में भ्रष्टाचार और बंदरबांट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कई बार देखा गया है कि योजनाएं अधूरी रह जाती हैं, लेकिन कागजों में उन्हें पूरा दिखाकर राशि निकाल ली जाती है। जांच की स्थिति में भी अक्सर लीपापोती कर दी जाती है और दोषियों को बचा लिया जाता है।

मड़वारानी जंगल की यह स्थिति न केवल वन्यजीव संरक्षण के लिए खतरा है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले समय में वन्य प्राणियों की मौत और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं और बढ़ सकती हैं।

अब जरूरत है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी योजनाओं का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके और जंगल के जीवों को उनका अधिकार — पानी — मिल सके।