अंदर से सेट हूं साहब, सिर्फ दिखावे की राजनीति है .. गरिष्ठ खाग्रेस जिलाध्यक्ष : पढ़ें डार्क सीक्रेट्स ऑफ कवर्धा 2
“कागज़ी कार्यकर्ताओ की फौज, पर्दे के खिलाड़ी और खाली मैदान जिले में कांग्रेस की हालत”
कवर्धा से लेकर पूरे जिले तक इन दिनों कांग्रेस की राजनीति एक अजीब मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। कागज़ों में ताकत, सोशल मीडिया पर सक्रियता और जमीन पर सन्नाटा यही आज की सबसे बड़ी पहचान बनती जा रही है।
सबसे पहले बात संगठन की।
कांग्रेस इन दिनों “लिस्ट निर्माण अभियान” में पूरी ताकत झोंके हुए है। हर दिन नई सूची, नए पदाधिकारी, नए नाम ऐसा लगता है मानो पार्टी का असली लक्ष्य चुनाव नहीं, बल्कि रिकॉर्ड बनाना हो। कागज़ों में इतनी बड़ी फौज तैयार हो चुकी है कि अगर फाइलें ही वोट डालतीं, तो नतीजे कब के बदल चुके होते।
लेकिन जमीन पर वही पुरानी कहानी कार्यकर्ता कम, सक्रियता और भी कम।
इसी के साथ पार्टी में एक नया ट्रेंड भी खूब फल-फूल रहा है
“पहले विरोध करो, फिर प्रवेश लेकर पद पाओ।”
कल तक जो नेता कांग्रेस को कोसते थे, आज पार्टी में आते ही सीधे जिम्मेदार पदों पर काबिज हो जाते हैं।
रवि चंद्रवंशी जैसे उदाहरण बताते हैं कि विचारधारा अब उतनी जरूरी नहीं, जितना सही समय पर सही दिशा में कदम बढ़ाना।
बड़े नेताओं के साथ नज़दीकियां भी तेजी से बनती हैं भूपेश बघेल और दीपक बैज जैसे चेहरों के साथ उठना-बैठना मानो नई पहचान का प्रमाणपत्र बन गया है।
लेकिन जैसे ही गंभीर आरोप सामने आते हैं, पार्टी का सिस्टम अचानक “मौन मोड” में चला जाता है।
दूसरी तरफ, अगर कोई साधारण कार्यकर्ता ग्रुप में सवाल उठा दे, तो उस पर कार्रवाई में सेकंड नहीं लगता।
यानी न्याय का तराजू भी अब “स्थिति अनुसार” काम करता है।
नेतृत्व की बात करें तो हालात और भी दिलचस्प हैं।
जो चेहरे पहले सत्ता में रहते हुए संगठन चलाते थे, वे आज भले ही सामने कम दिखते हों, लेकिन डोर अब भी उनके ही हाथ में बताई जाती है।
मंच पर नए चेहरे हैं, लेकिन स्क्रिप्ट पुरानी ही चल रही है।
इस बीच, पुराने कार्यकर्ता सबसे ज्यादा उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
सालों तक पार्टी के लिए मेहनत करने वाले आज खुद को “आउटडेटेड” मान लिए गए हैं जैसे उनका योगदान अब किसी काम का नहीं रहा।
राजनीति का तरीका भी बदल चुका है।
अब जनता से जुड़ाव का मतलब है वीडियो बनाना, पोस्ट डालना और व्यूज गिनना।
गाँव-गली में जाना जरूरी नहीं, बस सोशल मीडिया पर दिखना जरूरी है।
लेकिन जब सवाल उठता है कि “जनता से असल जुड़ाव कैसे होगा?”
तो जवाब में सन्नाटा ही सुनाई देता है।
जिला मुख्यालय कवर्धा की स्थिति तो और भी चिंताजनक है।
जहाँ से पूरे जिले की राजनीति संचालित होती है, वहीं कांग्रेस के पास ऐसा कोई दमदार चेहरा नजर नहीं आता, जिससे जनता जुड़ सके या जो लोगों की बात प्रभावी तरीके से रख सके।
नगर पालिका में विपक्ष की भूमिका भी केवल कागज़ों तक सीमित दिखाई देती है।
हालात ऐसे हैं कि जब कोई पत्रकार खबर चलाता है, तो नगर पालिका अध्यक्ष तुरंत JCB लेकर कार्रवाई करने निकल पड़ते हैं।
लेकिन विपक्ष… वो अब भी “खोज अभियान” का विषय बना हुआ है।
जनता के मन में अब सवाल उठने लगे हैं
“अगर मुद्दे उठाने का काम पत्रकार ही कर रहे हैं, तो विपक्ष आखिर कर क्या रहा है?”
इन सभी हालातों को जोड़कर देखें, तो तस्वीर साफ दिखाई देती है
कांग्रेस इस समय नेतृत्वहिंता, दिशाहिंता और जमीनी कमजोरी के दौर से गुजर रही है।
और राजनीति का एक सीधा नियम है
जहाँ विपक्ष कमजोर होता है, वहाँ सत्ता मजबूत हो जाती है।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर हालात नहीं बदले,
तो आने वाला चुनाव किसी कड़े मुकाबले की बजाय एक औपचारिक प्रक्रिया बन सकता है।
अंत में यही कहा जा सकता है
कांग्रेस के पास आज सब कुछ है
सूचियाँ, नेता, रणनीतियाँ और सोशल मीडिया की चमक…
बस एक चीज़ की कमी साफ दिख रही है
जमीन पर मौजूदगी और जनता का भरोसा।
वैसे आपको बता दे की रवि चंद्रवंशी जिनके ऊपर रेप जैसे गंभीर आरोप है, जो विधानसभा चुनाव 2023 मे कांग्रेस के ही खिलाफ चुनाव लडे थे उनपर आज तक कोई सांगठनात्मक कार्यवाही नहीं हो पायी है
अब या तो कांग्रेस को रेप जैसे मामले गंभीर नहीं लगते या फिर दूसरी पार्टी से आएगा नेता से मोहब्बत इतनी हो चुकी है की सारे आरोप दिखाई ही नहीं दे रहे