इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का विषय “Soil & Water Conservation Measures and Watershed Management Exercise” रखा गया है। इसके तहत अधिकारियों को वन क्षेत्रों में मृदा और जल संरक्षण की तकनीकों के साथ-साथ जलागम प्रबंधन की योजना तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत सभी 33 प्रोबेशनर्स अधिकारियों को चिन्हित चार नालों के आधार पर चार अलग-अलग समूहों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक समूह संबंधित नाले के आधार पर अध्ययन करते हुए पी.पी.आर. (Preliminary Project Report) और डी.पी.आर. (Detailed Project Report) तैयार करेगा।
प्रशिक्षण के पहले दिन कवर्धा वनमंडल के सभागार में परिचय सत्र आयोजित किया गया। इस दौरान Ajita Logjam (भा.व.से. 2012), वनमंडलाधिकारी Nikhil Agrawal, एनआरएम इंजीनियर Navneet Nayak, जीआईएस विशेषज्ञ (कैम्पा), उपवनमंडलाधिकारी तथा भोरमदेव अभ्यारण्य के अधीक्षक उपस्थित रहे।
अधिकारियों को प्रशिक्षण के दौरान Google Earth और QGIS सॉफ्टवेयर के माध्यम से प्रोजेक्ट तैयार करने की प्रक्रिया समझाई गई। इसमें डिजिटल मैपिंग, जल प्रवाह की दिशा, भू-आकृतिक संरचना और जल संरक्षण संरचनाओं की योजना तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई।
प्रशिक्षण के पश्चात सभी अधिकारियों ने अपने-अपने समूहों के अनुसार चयनित नालों का स्थल निरीक्षण किया। इस दौरान ग्राउंड ट्रूथिंग की प्रक्रिया के तहत वास्तविक स्थल परिस्थितियों का अध्ययन किया गया, ताकि तैयार की जाने वाली परियोजनाएं व्यावहारिक और प्रभावी हो सकें।
प्रशिक्षण के दूसरे दिन भी अधिकारियों को क्षेत्रीय भ्रमण के माध्यम से व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद सभी समूहों द्वारा अपने-अपने अध्ययन के आधार पर पीपीआर और डीपीआर तैयार किए जाएंगे।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण के कार्यों की गहन समझ विकसित करना और जलागम प्रबंधन के प्रभावी मॉडल तैयार करना है। इसमें ‘Ridge to Valley’ अवधारणा के आधार पर विभिन्न संरचनाओं का चयन किया जाता है।
इन संरचनाओं में ब्रशवुड चेक, बोल्डर चेक डेम, गेबियन स्ट्रक्चर, कंटूर ट्रेंच, स्टॉप डेम, चेक डेम, मिट्टी बांध और गली प्लग जैसी संरचनाएं शामिल हैं। इन उपायों के माध्यम से वन क्षेत्रों में जल संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण और मृदा संरक्षण को बढ़ावा दिया जाता है।
वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम से भावी वन अधिकारियों को प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की बेहतर समझ मिलती है, जिससे भविष्य में वन संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकेगा।