दीपक बैज ने कहा कि रमन सिंह अपने पत्र में नक्सलवाद की समस्या के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि उनके 15 साल के कार्यकाल (2003 से 2018) के दौरान ही नक्सलवाद बस्तर के तीन ब्लॉकों से बढ़कर प्रदेश के 14 जिलों तक फैल गया था। उन्होंने कहा कि राजधानी तक नक्सल प्रभाव पहुंचना उस समय की नीतियों की विफलता को दर्शाता है।
उन्होंने ताड़मेटला और झीरम घाटी जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये घटनाएं राज्य के इतिहास पर एक बड़ा कलंक हैं, जिनकी जिम्मेदारी उस समय की सरकार पर है। कांग्रेस का आरोप है कि रमन सिंह अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं।
दीपक बैज ने यह भी कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही की गई थी और वर्तमान सरकार ने इस दिशा में कोई नई पहल नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार केवल श्रेय लेने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस ने भाजपा के अंदरूनी हालात पर भी सवाल उठाए। बैज ने कहा कि रमन सिंह ने अपने पत्र में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का उल्लेख तक नहीं किया, जो भाजपा में गुटबाजी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भाजपा के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष साफ नजर आ रहा है।
दीपक बैज ने रमन सिंह द्वारा अमित शाह की तुलना सरदार वल्लभभाई पटेल से करने पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि इस तरह की तुलना करना इतिहास और महान व्यक्तित्वों का अपमान है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा कि यदि भाजपा यह दावा करती है कि नक्सलवाद समाप्त हो चुका है, तो रमन सिंह को अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि नक्सलवाद खत्म हो गया है, तो उन्हें मिली विशेष सुरक्षा भी वापस कर देनी चाहिए।
कुल मिलाकर, रायपुर में कांग्रेस और भाजपा के बीच नक्सलवाद के मुद्दे पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक गरमा सकता है, क्योंकि दोनों दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।