फेड ने ब्याज दर बढ़ाने के पीछे महंगाई को एक प्रमुख कारण बताया है। केंद्रीय बैंक के अनुसार महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है और मौजूदा कदम का उद्देश्य इसे 2 प्रतिशत के दीर्घकालिक लक्ष्य की ओर समय पर वापस लाना है। फेड चेयर केविन वॉर्श ने भी बैठक के बाद कहा कि महंगाई अभी बहुत अधिक और लगातार बनी हुई है, इसलिए केंद्रीय बैंक का मुख्य फोकस मूल्य स्थिरता पर है।
फेड के फैसले से पहले बाजार में दर बढ़ने की संभावना काफी हद तक शामिल हो चुकी थी। हालांकि, फैसले के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में कारोबार के दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिला। Reuters के मुताबिक, बुधवार के कारोबार के अंत में S&P 500 में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट रही, जबकि Nasdaq करीब 0.7 प्रतिशत नीचे बंद हुआ। Dow Jones में भी कमजोरी दर्ज की गई। बॉन्ड बाजार में भी हलचल रही और 2-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी देखने को मिली।
फेड के नए आर्थिक अनुमानों से आगे की मौद्रिक नीति को लेकर भी संकेत मिले हैं। 18 नीति-निर्माताओं में से 16 ने 2026 के अंत तक कम से कम एक और ब्याज दर बढ़ोतरी का अनुमान जताया है। इसके अनुसार फेड की दर 2026 के अंत तक 4 से 4.25 प्रतिशत के बीच पहुंच सकती है। हालांकि भविष्य के फैसले महंगाई, रोजगार, आर्थिक गतिविधियों और अन्य आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेंगे।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था के रोजगार बाजार को लेकर फेड का आकलन भी महत्वपूर्ण है। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि रोजगार में बढ़ोतरी कार्यबल की वृद्धि के अनुरूप रही है और बेरोजगारी दर में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। साथ ही घरेलू खर्च और पूंजी निवेश मजबूत रहने से आर्थिक गतिविधियों में मजबूती बनी हुई है। ऐसे में फेड के सामने महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक गतिविधियों को संतुलित रखने की चुनौती बनी हुई है।
अमेरिकी ब्याज दरों में बदलाव का असर केवल वहां के बाजार तक सीमित नहीं रहता। डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक पूंजी प्रवाह में बदलाव का असर दुनिया के दूसरे शेयर बाजारों के साथ सोने, चांदी और कच्चे तेल जैसी कमोडिटी पर भी पड़ सकता है। भारत जैसे उभरते बाजारों में भी विदेशी निवेश और मुद्रा बाजार के जरिए इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी महंगाई, रोजगार के आंकड़ों और फेड के अगले नीतिगत संकेतों पर रहेगी।