यह सड़क कोंटा, भेज्जी, चिंतागुफा और जगरगुंडा जैसे संवेदनशील इलाकों को जोड़ती है, जो लंबे समय से नक्सलियों का गढ़ माने जाते रहे हैं। सड़क निर्माण के दौरान नक्सलियों द्वारा बार-बार हमले किए गए, जिससे यह इलाका देश के सबसे खतरनाक क्षेत्रों में गिना जाने लगा।
इस मार्ग के निर्माण में अब तक 176 से अधिक जवानों ने अपनी जान न्यौछावर की है। 24 अप्रैल 2017 को बुर्कापाल में हुए नक्सली हमले में सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के 25 जवान शहीद हो गए थे। इसके अलावा 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला में हुए भीषण हमले में 76 जवानों की शहादत हुई थी, जो देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में से एक माना जाता है।
अरनपुर से जगरगुंडा तक के इस पूरे क्षेत्र में वर्षों तक बारूदी सुरंग विस्फोट और गोलीबारी की घटनाएं होती रहीं। अलग-अलग समय पर 49 से लेकर 100 से अधिक जवानों की शहादत के आंकड़े सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि इस सड़क को ‘खूनी सड़क’ कहा जाने लगा था।
हालांकि, इन तमाम चुनौतियों और बलिदानों के बावजूद शासन-प्रशासन और सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से अब यह सड़क पूरी हो चुकी है। यह केवल एक सड़क नहीं, बल्कि विकास, सुरक्षा और उम्मीद का प्रतीक बनकर उभरी है।
इस सड़क के बनने से अब दूरस्थ और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों को बड़ी राहत मिलेगी। आवागमन आसान होगा, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बेहतर होगी। साथ ही सुरक्षा बलों की आवाजाही भी तेज और सुरक्षित हो सकेगी, जिससे क्षेत्र में शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी।
सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण और कलेक्टर अमित कुमार ने भी इस उपलब्धि को सुरक्षा बलों और प्रशासन की संयुक्त मेहनत का परिणाम बताया है।
यह सड़क उन वीर जवानों की शहादत की याद दिलाती है, जिन्होंने देश की सुरक्षा और विकास के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। अब यह मार्ग क्षेत्र के विकास की नई कहानी लिखने के लिए तैयार है।