ग्राम भुरका की स्व. गेंदाबाई सेन को मिली साध्वी सबरी माता की उपाधि

मुंगेली जिले के भाठा-भुरका गांव की स्वर्गीय गेंदाबाई सेन का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण, तपस्वी और प्रेरणादायी रहा। अल्पायु में विधवा होकर भी उन्होंने भक्ति, सेवा और धैर्य के साथ पूरा जीवन समाज और परिवार को समर्पित किया, जिससे ग्रामवासियों ने उन्हें साध्वी सबरी माता की उपाधि दी।

Dec 10, 2025 - 11:33
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ग्राम भुरका की स्व. गेंदाबाई सेन को मिली साध्वी सबरी माता की उपाधि

 UNITED NEWS OF ASIA. मुंगेली | जिले के भाठा-भुरका गांव की निवासी स्वर्गीय गेंदाबाई सेन का जीवन संघर्ष, त्याग, भक्ति और आत्मसंयम का अनुपम उदाहरण है, जिन्होंने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी नारी गरिमा और मानवीय मूल्यों को बनाए रखा। गेंदाबाई का जन्म वर्ष 1963 में डिंडौरी निवासी झुमुक लाल सेन के परिवार में हुआ था।

समाज में प्रचलित बाल विवाह प्रथा के कारण मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह ग्राम भुरका निवासी सेवकराम सेन से हुआ। उस काल में अशिक्षा, अंधविश्वास और सामाजिक वैमनस्य के चलते समाज विभाजित था, जहां आपसी मेलजोल तक बंद था, किंतु उनके पति सेवकराम सेन शिक्षित, मिलनसार और समाज को जोड़ने की भावना से प्रेरित थे।

 विवाह के दो वर्ष बाद एक पुत्री संतोषी का जन्म हुआ, लेकिन दुर्भाग्यवश सेवकराम अत्यंत गंभीर बीमारी टीबी से ग्रसित हो गए। गरीबी के कारण उचित इलाज संभव नहीं हो सका और उनका निधन हो गया, जिससे मात्र 19 वर्ष की आयु में गेंदाबाई विधवा हो गईं। पति के निधन के दिन ही सेवकराम के सेवाभाव से प्रेरित होकर समाज एकजुट हुआ, परंतु गेंदाबाई के जीवन में दुखों का अंत नहीं हुआ। पति के बाद सास की भी मृत्यु हो गई, जिससे वे अपनी नन्ही बेटी के साथ अकेली रह गईं।

 इस विकट परिस्थिति में उन्होंने सांसारिक मोह को त्याग कर स्वयं को भक्ति मार्ग से जोड़ लिया और वर्ष 1984 में ग्राम भुरका में महिला मानस मंडली का गठन कर भजन-कीर्तन के माध्यम से साध्वी जीवन प्रारंभ किया। समाज की आलोचनाओं और तानों के बावजूद वे अपने धर्म पथ पर अडिग रहीं। बेटी संतोषी का विवाह कापादह निवासी प्रहलाद सेन से किया गया, जिससे उन्हें कुछ संतोष मिला। आगे चलकर संतोषी को तीन पुत्र और एक पुत्री हुई, लेकिन नियति ने पुनः क्रूर परीक्षा ली और कोरोना काल वर्ष 2020 में बीमारी के दौरान संतोषी का भी निधन हो गया।

इसके बाद गेंदाबाई अपने दामाद और नाती-पोतों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। लगभग 40 वर्षों तक अपार दुख, तपस्या और सेवा के बीच जीवन व्यतीत करते हुए 03 दिसंबर को 62 वर्ष की आयु में उन्होंने देवलोक गमन किया। उनके धैर्य, संयम, साध्वी जीवन और भक्ति भावना से प्रेरित होकर समस्त ग्रामवासियों ने उन्हें श्रद्धापूर्वक “साध्वी सबरी माता” की उपाधि दी। नारी शक्ति, त्याग और भक्ति की इस महान प्रतिमूर्ति को शत्-शत् नमन।