मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू शब्द को किसी विशेष भाषा, पूजा पद्धति या जीवन शैली तक सीमित करके परिभाषित नहीं किया जा सकता। उन्होंने भारत की परंपरा में सेवा और मानवता के भाव को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जब भी दुनिया के किसी हिस्से से भारत से मदद मांगी गई, भारत ने कभी इनकार नहीं किया। उनके अनुसार जरूरतमंदों की सहायता के लिए हाथ बढ़ाना भारत की परंपरा और उसके स्वभाव का हिस्सा है।
अपने संबोधन में उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि खुले विचारों वाले और ज्ञान से संपन्न लोग इस विचार को स्वीकार करते हैं। वसुधैव कुटुंबकम का अर्थ पूरी पृथ्वी को एक परिवार के रूप में देखना है। उन्होंने कहा कि भारत की सोच में मानव समाज को अलग-अलग समूहों में बांटने के बजाय व्यापक स्तर पर एक परिवार के रूप में देखने की भावना रही है।
मोहन भागवत ने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग विचार, परंपराएं और जीवन पद्धतियां होने के बावजूद विविधता को एकता के लिए चुनौती नहीं माना जाता। इसके विपरीत भारत में विविधता को ही एकता का स्वरूप समझा जाता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग भारत आए और अपनी विशिष्टताओं के साथ यहां आगे बढ़े तथा आज वे भारतीय नागरिक हैं।
उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया की सेवा की और अपने चरित्र के कारण विश्वगुरु बना, केवल शक्ति के आधार पर नहीं। उन्होंने भारतीय संस्कृति के सेवा भाव और मानवीय दृष्टिकोण को इसकी प्रमुख विशेषता बताया। उनके अनुसार विदेशों में रहने वाले भारतीयों के प्रति लोगों का सम्मान भी भारत की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है।
कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने हिंदू समाज और भारतीय परंपरा को व्यापक मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ते हुए मित्रता और सेवा की भावना पर जोर दिया। उन्होंने मुस्लिम, ईसाई और यहूदी समुदायों का भी उल्लेख किया और कहा कि भारत की परंपरा जरूरतमंदों की सहायता और सभी के प्रति सहयोग की भावना को महत्व देती है।
टोरंटो में आयोजित इस कार्यक्रम के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सेवा, विविधता और वैश्विक भाईचारे के विचारों पर चर्चा हुई। मोहन भागवत के संबोधन में वसुधैव कुटुंबकम को केंद्र में रखते हुए भारत की परंपराओं और विश्व के प्रति उसके दृष्टिकोण को सामने रखा गया।