PMOS जागरूकता महीना: क्या PMOS के बावजूद महिलाएं बन सकती हैं मां? जानिए गर्भधारण से जुड़ी जरूरी बातें

PMOS एक हार्मोनल स्थिति है, जो अनियमित पीरियड्स, ओव्यूलेशन में समस्या और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। हालांकि PMOS होने का मतलब यह नहीं है कि महिला गर्भवती नहीं हो सकती। सही चिकित्सकीय सलाह, जीवनशैली में बदलाव और जरूरत पड़ने पर फर्टिलिटी उपचार की मदद से गर्भधारण संभव हो सकता है।

Sep 12, 2026 - 14:04
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PMOS जागरूकता महीना: क्या PMOS के बावजूद महिलाएं बन सकती हैं मां? जानिए गर्भधारण से जुड़ी जरूरी बातें

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l PMOS जागरूकता महीने के दौरान महिलाओं में हार्मोनल और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। PMOS, जिसे पहले PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के नाम से जाना जाता था, एक ऐसी हार्मोनल स्थिति है जो महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता, ओव्यूलेशन में परेशानी, मेटाबोलिक बदलाव और प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकती है। हालांकि PMOS होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि महिला गर्भवती नहीं हो सकती। उचित जांच, चिकित्सकीय सलाह और जरूरत के अनुसार उपचार के माध्यम से गर्भधारण की संभावना को बेहतर किया जा सकता है।

डॉ. रिचा चौबे, कंसल्टेंट, ऑब्स्ट्रेट्रिक्स एवं गायनोकोलॉजी, एमएमआई नारायणा मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, रायपुर के अनुसार PMOS महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसे गर्भधारण की अंतिम बाधा नहीं माना जाना चाहिए। PMOS में हार्मोनल असंतुलन के कारण ओव्यूलेशन नियमित रूप से नहीं हो पाता। गर्भधारण के लिए ओव्यूलेशन जरूरी होता है, इसलिए जिन महिलाओं में अंडे के विकसित होने और निकलने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, उन्हें गर्भधारण में अधिक समय लग सकता है।

भारत में PMOS से जुड़ी समस्या के व्यापक होने की ओर विभिन्न अध्ययनों ने भी ध्यान आकर्षित किया है। 2018 से 2022 के बीच किए गए ICMR-PCOS अध्ययन में देशभर में करीब 10 हजार महिलाओं की जांच की गई थी। अध्ययन में प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में इस स्थिति की उल्लेखनीय मौजूदगी सामने आई थी। इसके साथ ही कई महिलाओं में मेटाबोलिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम भी पाए गए थे। ऐसे में PMOS को केवल मासिक धर्म या प्रजनन क्षमता की समस्या के रूप में देखने के बजाय संपूर्ण स्वास्थ्य से जोड़कर समझना जरूरी है।

PMOS में मासिक धर्म अनियमित हो सकता है और कई बार पीरियड्स के बीच लंबा अंतर हो सकता है। यह भी जरूरी नहीं कि पीरियड आने का मतलब हर बार ओव्यूलेशन हुआ हो। इसी कारण गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं के लिए डॉक्टर से सलाह लेकर ओव्यूलेशन और हार्मोनल स्थिति का मूल्यांकन कराना उपयोगी हो सकता है। उपचार का चुनाव महिला की उम्र, स्वास्थ्य, मासिक धर्म चक्र और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

गर्भधारण की इच्छा रखने वाली कुछ महिलाओं में जीवनशैली में सुधार भी उपचार का हिस्सा हो सकता है। संतुलित और पौष्टिक आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार वजन प्रबंधन से समग्र स्वास्थ्य बेहतर करने में मदद मिल सकती है। वजन में बदलाव की जरूरत हर महिला में अलग हो सकती है, इसलिए किसी भी लक्ष्य को डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार तय करना चाहिए।

जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ओव्यूलेशन बढ़ाने वाली दवाओं की सलाह दे सकते हैं। लेट्रोजोल या क्लोमीफीन जैसी दवाओं का इस्तेमाल कुछ मामलों में किया जाता है, जबकि मेटफॉर्मिन का उपयोग मुख्य रूप से इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी स्थिति में किया जा सकता है। इन दवाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के लेना उचित नहीं है, क्योंकि उपचार का तरीका व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।

कुछ मामलों में जब सामान्य उपचार से गर्भधारण संभव नहीं हो पाता, तो डॉक्टर असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी यानी ART की सलाह दे सकते हैं। इसमें IVF और ICSI जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। कौन-सी प्रक्रिया उपयुक्त होगी, इसका निर्णय फर्टिलिटी विशेषज्ञ जांच और चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर करते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार PMOS को लंबे समय तक प्रबंधित करने की जरूरत पड़ सकती है और गर्भावस्था होने के बाद भी नियमित चिकित्सकीय देखभाल जरूरी रहती है। गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं को स्वयं दवा लेने के बजाय स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। संतुलित आहार, नियमित गतिविधि, ब्लड शुगर सहित जरूरी स्वास्थ्य मानकों की निगरानी और डॉक्टर की सलाह का पालन PMOS के बेहतर प्रबंधन में मदद कर सकता है।