धान की फसल को रोग और कीट प्रकोप से बचाने कृषि वैज्ञानिकों ने दी समन्वित प्रबंधन की सलाह

कवर्धा में कृषि विज्ञान केंद्र ने धान की फसल को प्रमुख रोगों और कीटों से बचाने किसानों को नियमित निगरानी, समय पर पहचान और अनुशंसित प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने ब्लास्ट, झुलसा, भूरे धब्बे और शीथ ब्लाइट सहित प्रमुख रोगों तथा तना छेदक, भूरा माहू, पत्ती लपेटक, पैनिकल माइट और लाल कीड़ा जैसे कीटों के नियंत्रण के लिए आवश्यक सुझाव जारी किए हैं।

Sep 9, 2026 - 11:21
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धान की फसल को रोग और कीट प्रकोप से बचाने कृषि वैज्ञानिकों ने दी समन्वित प्रबंधन की सलाह

UNITED NEWS OF ASIA. कवर्धा l छत्तीसगढ़ में खरीफ मौसम की प्रमुख फसल धान में वर्तमान मौसम के दौरान विभिन्न रोगों और कीटों का प्रकोप बढ़ने की संभावना को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। कृषि विज्ञान केंद्र, कवर्धा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.पी. त्रिपाठी ने धान की फसल को रोग एवं कीट प्रकोप से बचाने के लिए किसानों के लिए उपयोगी सलाह जारी की है। उन्होंने कहा कि फसल की नियमित निगरानी और शुरुआती अवस्था में रोग एवं कीटों की पहचान कर उचित प्रबंधन अपनाने से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

धान में ब्लास्ट रोग प्रमुख बीमारियों में शामिल है। इसके प्रकोप की स्थिति में पत्तियों पर आंख या नाव के आकार के धब्बे दिखाई देते हैं। ऐसे लक्षण नजर आने पर किसानों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार पोटाश और अनुशंसित फफूंदनाशक का उपयोग करने की सलाह दी गई है। जीवाणु जनित झुलसा रोग में पत्तियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं तथा पत्तियों के किनारों पर सूखापन दिखाई देता है। इस प्रकार के लक्षण मिलने पर अनुशंसित मात्रा में स्ट्रेप्टोसाइक्लिन एवं मैंकोजेब का प्रयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया जा सकता है। धान में भूरे धब्बे दिखाई देने पर मैंकोजेब अथवा ट्राइसाइक्लाजोल के अनुशंसित उपयोग की सलाह दी गई है।

शीथ ब्लाइट भी धान की फसल में होने वाला महत्वपूर्ण रोग है। अधिक नमी और जलभराव की स्थिति में इसका प्रसार तेजी से हो सकता है। रोग की शुरुआती अवस्था में धान के तने और पत्ती की शीथ पर मटमैले रंग के चकत्तेनुमा धब्बे दिखाई देते हैं। समय पर नियंत्रण नहीं होने पर धब्बे बढ़ सकते हैं और इसका असर पौधे की वृद्धि तथा उत्पादन पर पड़ सकता है। किसानों को खेत में अनावश्यक जलभराव से बचने, फसल की नियमित निगरानी करने और शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर उचित फफूंदनाशक का प्रयोग करने को कहा गया है।

कृषि वैज्ञानिकों ने धान में लगने वाले प्रमुख कीटों की समय पर पहचान को भी महत्वपूर्ण बताया है। तना छेदक, भूरा माहू, पत्ती लपेटक, बंकी, गंगई, कटुवा, गंधी कीट, पैनिकल माइट और लाल कीड़ा धान की फसल को प्रभावित कर सकते हैं। तना छेदक के नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल 0.3 जी अथवा क्लोरेंट्रानिलीप्रोल 4 जी का अनुशंसित मात्रा में खाद या रेत में मिलाकर प्रयोग करने की सलाह दी गई है। भूरा माहू के नियंत्रण के लिए ब्यूप्रोफेजिन 25 एससी, डाइनोटेफ्यूरान 20 एसजी अथवा डाइनोटेफ्यूरान-पाइमेट्रोजिन जैसे अनुशंसित कीटनाशकों का कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में उपयोग किया जा सकता है।

पैनिकल माइट की रोकथाम के लिए स्पाइरोमेसिफेन 22.9 एससी तथा लाल कीड़े के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूजी के अनुशंसित उपयोग की सलाह दी गई है। कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों से अपील की है कि वे बिना आवश्यकता के कीटनाशक और फफूंदनाशक का अत्यधिक प्रयोग न करें। दवाओं का उपयोग केवल अनुशंसित मात्रा और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया जाए। रोग या कीट के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल कृषि विभाग अथवा कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करना चाहिए। खेत की स्थिति, मौसम, फसल की अवस्था और प्रकोप की तीव्रता को ध्यान में रखते हुए समन्वित कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाने से धान की फसल को नुकसान से बचाने के साथ उत्पादन और किसानों की आय को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।