अफसरों पर केस दर्ज करने से पहले सरकार की मंजूरी जरूरी, PHQ ने जारी किए निर्देश

मध्य प्रदेश में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ उनके शासकीय कार्यों से जुड़े मामलों में केस दर्ज करने से पहले सरकार की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया है। पुलिस मुख्यालय ने हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के 19 जुलाई 2026 के आदेश का हवाला देते हुए सभी पुलिस इकाइयों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 के प्रावधानों का पालन करने के निर्देश दिए हैं। लोकायुक्त के करीब 295 मामले फिलहाल अभियोजन स्वीकृति के लिए सरकार के पास लंबित बताए गए हैं।

Sep 13, 2026 - 16:25
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अफसरों पर केस दर्ज करने से पहले सरकार की मंजूरी जरूरी, PHQ ने जारी किए निर्देश

UNITED NEWS OF ASIA. मध्य प्रदेश में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ उनके शासकीय कार्यों से जुड़े मामलों में अब कानूनी कार्रवाई से पहले सरकार की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। पुलिस मुख्यालय ने इस संबंध में प्रदेश की सभी पुलिस इकाइयों को निर्देश जारी किए हैं। PHQ ने हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के 19 जुलाई 2026 के आदेश का हवाला देते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 218 के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के लिए कहा है। इस निर्देश के बाद सरकारी पद पर रहते हुए किए गए आधिकारिक कार्यों को लेकर अधिकारियों के खिलाफ दर्ज होने वाले मामलों की प्रक्रिया में अभियोजन स्वीकृति महत्वपूर्ण हो गई है।

जानकारी के अनुसार हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक ऐसे मामले में अदालत द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को निरस्त कर दिया था, जिसमें अभियोजन स्वीकृति के बिना आगे की कार्रवाई की गई थी। अदालत के इसी आदेश को आधार बनाकर पुलिस मुख्यालय ने सभी पुलिस इकाइयों को संबंधित प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। इसका मतलब यह है कि यदि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ उसके आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कार्य को लेकर आपराधिक मामला सामने आता है, तो संबंधित कार्रवाई में सरकार से पूर्व अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता होगी।

BNSS की धारा 218 के तहत सरकारी पद पर रहते हुए किए गए कार्यों के संबंध में अभियोजन शुरू करने से पहले सक्षम सरकार की मंजूरी का प्रावधान है। पुलिस मुख्यालय के निर्देशों में इसी कानूनी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए पुलिस अधिकारियों को कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। इसका उद्देश्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ उनके आधिकारिक कार्यों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया को निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप संचालित करना है। हालांकि, यह प्रावधान अधिकारियों के निजी या पद से असंबंधित कार्यों पर किस प्रकार लागू होगा, यह मामले की परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

इस व्यवस्था का असर लोकायुक्त से जुड़े मामलों पर भी दिखाई दे सकता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वर्तमान में लोकायुक्त के करीब 295 मामले सरकार के पास अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित हैं। इन मामलों में सरकार की मंजूरी मिलने के बाद ही संबंधित मामलों में अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इससे उन मामलों की संख्या भी सामने आती है, जिनमें भ्रष्टाचार या सरकारी कामकाज से जुड़े आरोपों को लेकर कानूनी कार्रवाई के लिए स्वीकृति का इंतजार किया जा रहा है।

पुलिस मुख्यालय के नए निर्देशों के बाद प्रदेश की पुलिस इकाइयों को अधिकारियों के खिलाफ मामलों में कार्रवाई करते समय अभियोजन स्वीकृति से जुड़े नियमों पर विशेष ध्यान देना होगा। हाईकोर्ट के आदेश और BNSS की धारा 218 के प्रावधानों के अनुरूप कार्रवाई नहीं होने पर न्यायिक स्तर पर मामला प्रभावित हो सकता है। ऐसे में सरकारी अधिकारियों से जुड़े प्रकरणों में पुलिस की प्रारंभिक कार्रवाई से लेकर अभियोजन की अनुमति तक पूरी प्रक्रिया को निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुसार आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।