आधुनिक प्रबंधन से बढ़ेगा छत्तीसगढ़ में मछली उत्पादन, केज कल्चर को बढ़ावा देने पर जोर

छत्तीसगढ़ में मत्स्य पालन को आधुनिक तकनीक से मजबूत करने के लिए मत्स्य पालन विभाग और ICAR-CIFRI बैरकपुर के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें केज कल्चर और तालाबों में मछलियों की बीमारियों की रियल-टाइम पहचान, रोकथाम और वैज्ञानिक उपचार के साथ जलाशयों एवं मछली स्वास्थ्य का डेटाबेस तैयार करने पर चर्चा हुई।

Sep 12, 2026 - 08:53
 0  2
आधुनिक प्रबंधन से बढ़ेगा छत्तीसगढ़ में मछली उत्पादन, केज कल्चर को बढ़ावा देने पर जोर

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l छत्तीसगढ़ में उपलब्ध समृद्ध जल संसाधनों और जलाशयों का बेहतर उपयोग करते हुए मछली उत्पादन बढ़ाने की दिशा में राज्य सरकार द्वारा आधुनिक प्रबंधन तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य से मत्स्य पालन विभाग, छत्तीसगढ़ और आईसीएआर-सीआईएफआरआई बैरकपुर, कोलकाता के संयुक्त सहयोग से रायपुर स्थित मत्स्य पालन विभाग कार्यालय में दो दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में केज कल्चर यानी पिंजरा पालन और पारंपरिक तालाब आधारित मत्स्य पालन को वैज्ञानिक तकनीकों से अधिक प्रभावी बनाने पर विशेषज्ञों ने जानकारी साझा की।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य मछली पालकों को मछलियों में होने वाली बीमारियों की समय पर पहचान, रोकथाम और वैज्ञानिक उपचार की आधुनिक तकनीकों से परिचित कराना था। विशेषज्ञों ने रियल-टाइम डायग्नोस्टिक्स के महत्व पर चर्चा करते हुए बताया कि मछलियों में बीमारी के शुरुआती लक्षणों की पहचान होने से समय रहते आवश्यक प्रबंधन और उपचार संबंधी कदम उठाए जा सकते हैं। इससे मछली पालन में होने वाले संभावित नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।

कार्यशाला में आईसीएआर-सीआईएफआरआई के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. असित कुमार बेरा और सोहिनी चटर्जी ने किसानों एवं अधिकारियों को तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने केज कल्चर और तालाबों में मछलियों में होने वाली विभिन्न बीमारियों के संभावित लक्षणों, उनकी रोकथाम तथा वैज्ञानिक उपचार के बारे में विस्तार से समझाया। वैज्ञानिकों ने मछली पालन में नियमित निगरानी, जल गुणवत्ता और स्वास्थ्य प्रबंधन को महत्वपूर्ण बताया तथा किसानों को वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

दो दिवसीय कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जिलों से केज कल्चर से जुड़े लगभग 50 से 60 मत्स्य पालकों और पारंपरिक तालाब आधारित मत्स्य पालन करने वाले लगभग 50 से 60 किसानों ने भाग लिया। इसके अलावा अलग-अलग जिलों से आए मत्स्य विभाग के अधिकारियों ने भी प्रशिक्षण और चर्चा में सक्रिय सहभागिता की। किसानों और विभागीय अधिकारियों के बीच अनुभव साझा करने के साथ स्थानीय स्तर पर आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा की गई।

कार्यशाला के दौरान राज्य में मत्स्य पालन के बेहतर प्रबंधन के लिए भविष्य की रणनीतियों पर भी मंथन हुआ। इसमें फील्ड लेवल पर जांच व्यवस्था को मजबूत करने और खेत तथा जलस्रोत के स्तर पर ही मछलियों में होने वाली बीमारियों की जल्द पहचान करने की जरूरत पर जोर दिया गया। इसके साथ ही मैदानी कर्मचारियों को रोग रिपोर्टिंग का प्रशिक्षण देने और मछली रोगों से संबंधित सूचनाओं को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने की दिशा में भी चर्चा हुई।

विशेषज्ञों ने भविष्य के बेहतर प्रबंधन के लिए जलाशयों और मछलियों के स्वास्थ्य से संबंधित डेटाबेस तैयार करने की आवश्यकता बताई। इस तरह के रिकॉर्ड से बीमारी की स्थिति, उत्पादन और जलाशय प्रबंधन से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित करने में सहायता मिल सकती है। इससे विभाग को योजनाएं बनाने और जरूरत के अनुसार तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने में भी सुविधा होने की उम्मीद है।

कार्यक्रम में संचालक मत्स्य पालन एन.एस. नाग, मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष आनंद निषाद, उपाध्यक्ष डॉ. लखन लाल धीवर, मत्स्य पालन प्रशिक्षण संस्थान की उप-संचालक बीना गड़पाले और सहायक मत्स्य अधिकारी विकास कुमार साहू सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। अतिथियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने राज्य में मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक, प्रशिक्षण और एकीकृत प्रबंधन को महत्वपूर्ण बताया।