किशाऊ बांध परियोजना पर छह राज्यों में बड़ा समझौता, 15 हजार करोड़ की परियोजना से जल और बिजली संकट के समाधान की उम्मीद
करीब छह दशक से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच अहम समझौता हुआ है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15 हजार करोड़ रुपये है। टोंस नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना से 660 मेगावॉट बिजली उत्पादन, 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई और उत्तर भारत में पेयजल उपलब्धता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। केंद्र जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगा।
UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। उत्तर भारत की लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को आगे बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच परियोजना को लेकर सहमति बनने के बाद अब समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में जून में हुई उच्चस्तरीय बैठक में छह राज्यों के बीच परियोजना को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी थी और 15 सितंबर को समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया निर्धारित की गई। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल भी इस पूरी प्रक्रिया में शामिल हैं।
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना करीब छह दशक से विभिन्न कारणों से अटकी हुई थी। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15 हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है। लंबे समय तक राज्यों के बीच वित्तीय हिस्सेदारी, पानी के बंटवारे और बिजली से जुड़े लाभों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। खासतौर पर हिमाचल प्रदेश की ओर से परियोजना के वित्तीय बोझ को लेकर आपत्ति जताई गई थी। नई व्यवस्था में इस विवाद को दूर करने के लिए जल और बिजली घटकों की लागत तथा लाभों को अलग-अलग तरीके से निर्धारित किया गया है।
परियोजना के तहत जल घटक की लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत वित्तीय भार छह भागीदार राज्यों द्वारा साझा किया जाएगा। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को देने पर भी सहमति बनी है। इसके बदले इन राज्यों की ओर से हिमाचल प्रदेश के बिजली घटक की लागत में योगदान किया जाएगा। केंद्र सरकार के अनुसार इस व्यवस्था से लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय और जल बंटवारे से जुड़े मतभेदों को दूर करने में मदद मिलेगी।
किशाऊ परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा के पास टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। परियोजना में करीब 236 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी डैम के निर्माण की योजना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इससे करीब 660 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता विकसित होगी। परियोजना से जुड़ी रिपोर्टों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच बिजली के लाभ के बंटवारे की व्यवस्था का भी उल्लेख है। यह परियोजना सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिहाज से उत्तर भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
किशाऊ बांध के निर्माण से करीब 97 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने का अनुमान है। इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में भी परियोजना की भूमिका बताई जा रही है। टोंस-यमुना बेसिन में जल उपलब्धता बढ़ने से कृषि और पेयजल आपूर्ति को मजबूती मिलने की उम्मीद है। परियोजना से हरित ऊर्जा उत्पादन भी होगा, जिससे बिजली क्षेत्र में अतिरिक्त क्षमता विकसित की जा सकेगी।
इस परियोजना को केवल एक बांध निर्माण योजना के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे उत्तर भारत में जल संसाधन प्रबंधन और अंतरराज्यीय समन्वय के बड़े उदाहरण के तौर पर भी देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने किशाऊ परियोजना सहित विभिन्न जल विवादों और लंबित समझौतों को बातचीत के जरिए सुलझाने पर जोर दिया है। जून में बनी सहमति के बाद अब छह राज्यों के बीच समझौता प्रक्रिया को परियोजना के निर्माण की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है।
किशाऊ परियोजना के आगे बढ़ने से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान को अलग-अलग स्तर पर लाभ मिलने की उम्मीद है। हालांकि परियोजना के निर्माण के लिए समझौते के बाद भी आगे की प्रशासनिक, तकनीकी और वित्तीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। समझौते के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाना प्रस्तावित है। ऐसे में किशाऊ बांध परियोजना अब दशकों की देरी से निकलकर क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ती नजर आ रही है।