कर्नाटक सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक समारोहों में ‘वंदे मातरम’ का गायन या वादन किया जाना है, लेकिन सामान्य सरकारी कार्यक्रमों में इसके पहले दो पद ही प्रस्तुत किए जाएंगे। हालांकि, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल की मौजूदगी वाले कार्यक्रमों के लिए पूरा गीत प्रस्तुत करने का प्रावधान रखा गया है। सरकार ने अपने फैसले के पीछे सरकारी कार्यक्रमों में एकरूपता, गरिमा और उचित प्रोटोकॉल बनाए रखने की बात कही है।
यह आदेश 3 सितंबर को हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में लिए गए फैसले के बाद 8 सितंबर को कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग की ओर से जारी किया गया। राज्य सरकार ने आदेश में केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का संदर्भ भी दिया है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि केंद्र के स्तर पर निर्धारित प्रोटोकॉल में ‘वंदे मातरम’ के पूरे आधिकारिक संस्करण के संबंध में अलग व्यवस्था है और राज्य सरकार का दो पद तक सीमित करने वाला आदेश उससे मेल नहीं खाता।
इस विवाद की पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जनवरी 2026 में ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों के आधिकारिक उपयोग से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे। जब ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान दोनों किसी कार्यक्रम में प्रस्तुत किए जाते हैं, तब इनके क्रम को लेकर भी प्रोटोकॉल निर्धारित किया गया है। इसी व्यवस्था को लेकर कर्नाटक सरकार के आदेश और केंद्र के निर्देशों के बीच कथित अंतर अब न्यायिक चुनौती का आधार बना है।
विवाद उस समय भी चर्चा में आया था जब शिवमोग्गा में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान बीजेपी विधायक एस.एन. चन्नबसप्पा ने ‘वंदे मातरम’ को छोटा किए जाने पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने कार्यक्रम से बाहर जाते हुए सवाल उठाया कि राष्ट्रीय गीत को बीच में क्यों रोका जा रहा है और राज्य सरकार को केंद्र के दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। इसके बाद राज्य सरकार के आदेश को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
अब हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका के जरिए राज्य सरकार के आदेश की वैधानिकता और केंद्र के दिशा-निर्देशों के साथ उसकी संगति का मुद्दा उठाया गया है। अदालत इस मामले में याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करती है या नहीं और राज्य सरकार के आदेश पर कोई निर्देश जारी करती है या नहीं, यह आगे की न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्ट होगा। फिलहाल ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर कर्नाटक में प्रशासनिक आदेश, राजनीतिक विरोध और कानूनी चुनौती तीनों स्तर पर मामला चर्चा में बना हुआ है।