नदी की जमीन के बदले हाईवे किनारे करोड़ों की जमीन आवंटन पर उठे सवाल, जशपुर में बड़ा विवाद
जशपुर जिले में नदी किनारे की जमीन के बदले स्टेट हाईवे से लगी करोड़ों रुपए की जमीन आवंटित किए जाने का मामला विवादों में आ गया है। आरोप है कि दस्तावेजों में कथित हेराफेरी और ओवरराइटिंग कर जमीन आवंटन कराया गया। मामले में पंचायत रिकॉर्ड और राजस्व प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
UNITED NEWS OF ASIA . योगेश यादव, जशपुर l छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में जमीन आवंटन से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। आरोप है कि नदी किनारे स्थित कम कीमत वाली जमीन खरीदकर दस्तावेजों में कथित हेराफेरी की गई और बाद में उसी जमीन को नदी में समाहित बताकर मुआवजे के रूप में स्टेट हाईवे किनारे करोड़ों रुपए मूल्य की जमीन हासिल कर ली गई। इस पूरे मामले ने राजस्व विभाग, पंचायत रिकॉर्ड और प्रशासनिक फैसलों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार Om Prakash Agrawal ने 1 जून 2012 को खसरा नंबर 100/2 की जमीन राजेंद्र प्रसाद, अवधेश कुमार और सुमित्रा सिंह से लगभग 7 लाख 23 हजार रुपए में खरीदी थी। बताया जा रहा है कि यह जमीन नदी किनारे स्थित थी। बाद में दावा किया गया कि जमीन का कुछ हिस्सा नदी में समाहित हो गया, जिसके एवज में वैकल्पिक जमीन की मांग की गई। हालांकि स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित भूमि पहले से ही नदी क्षेत्र में थी और नदी में समाहित हुई जमीन का रकबा भी काफी कम था।
विवाद का सबसे बड़ा कारण यह है कि नदी किनारे की जमीन के बदले स्टेट हाईवे से लगी व्यावसायिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण और करोड़ों रुपए कीमत की जमीन कैसे आवंटित कर दी गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि नियमों के अनुसार वैकल्पिक जमीन उसी स्थिति में दी जा सकती है, जब संबंधित व्यक्ति के पास गुजारे या खेती के लिए अन्य जमीन उपलब्ध न हो। ऐसे में हाईवे किनारे की बेशकीमती जमीन का आवंटन कई सवाल खड़े कर रहा है।
जानकारी के मुताबिक यह मामला वर्ष 2023 में कलेक्टर कोर्ट पहुंचा था। सुनवाई के बाद कलेक्टर कोर्ट ने छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रावधानों का हवाला देते हुए आवेदन को “विचारणीय एवं प्रचलन योग्य नहीं” मानते हुए निरस्त कर दिया था। यानी प्रारंभिक स्तर पर प्रशासन ने इसे नियमों के अनुरूप नहीं माना था। लेकिन बाद में कमीशन कोर्ट से Om Prakash Agrawal के पक्ष में फैसला आने के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया।
अब सवाल उठ रहे हैं कि जिन नियमों और दस्तावेजों के आधार पर कलेक्टर कोर्ट ने आवेदन खारिज किया था, वही तथ्य बाद की प्रक्रिया में क्यों नजरअंदाज कर दिए गए। मामले में यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि पंचायत रिकॉर्ड में ओवरराइटिंग, काटछांट और सफेदा का इस्तेमाल किया गया। बगीचा जनपद क्षेत्र की बिमड़ा पंचायत की 19 जून 2023 की बैठक पंजी में कथित रूप से कई जगह संशोधन और सफेदा लगाए जाने की बात कही जा रही है।
स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए तो जमीन आवंटन और दस्तावेजी हेराफेरी से जुड़े कई बड़े खुलासे हो सकते हैं। मामले को लेकर मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों को लिखित शिकायत भी भेजी गई है। अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन दोबारा जांच कर विवादित जमीन आवंटन को निरस्त करता है या नहीं।
फिलहाल यह मामला केवल जमीन आवंटन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, राजस्व व्यवस्था और सरकारी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।