गुडुंम पहाड़ में जुटा आस्था का सैलाब, 44 गांवों समेत कई राज्यों से पहुंचे आदिवासी समाज के लोग
कांकेर जिले के गुडुंम पहाड़ में आदिवासी समाज के पारंपरिक वार्षिक पूजा आयोजन में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। बंडा परगना के 44 गांवों के अलावा कांकेर जिले के विभिन्न क्षेत्रों तथा महाराष्ट्र और ओडिशा समेत कई इलाकों से आदिवासी समाज के लोग यहां पहुंचे। आयोजन में पूजा-अर्चना के साथ आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकजुटता की झलक देखने को मिली।
UNITED NEWS OF ASIA. रोहित देहारी, पखांजूर l कांकेर जिले के क्षेत्र में स्थित गुडुंम पहाड़ में आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिला। गोण्डाहूर, कोयगांव, हांकेर, मातलकुडुम और हिदुर-मरकाहुर गांवों के मध्य स्थित गुडुंम पहाड़ में हर वर्ष आदिवासी समाज द्वारा अपने पारंपरिक पेन पुरखा की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसी परंपरा के तहत आयोजित वार्षिक पूजा में इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और समाज के लोग शामिल हुए।
गुडुंम पहाड़ आदिवासी समाज के लिए आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। समाज के लोगों के अनुसार, यहां लंबे समय से पेन पुरखा की स्थापना कर पारंपरिक तरीके से पूजा की जाती रही है। साल में एक बार आयोजित होने वाले इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का समाज के लोगों को पूरे वर्ष इंतजार रहता है। आयोजन के दौरान दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग गुडुंम पहाड़ पहुंचकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
इस वर्ष आयोजित वार्षिक पूजा में बंडा परगना के 44 गांवों के लोगों की विशेष भागीदारी रही। इसके अलावा कांकेर जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग यहां पहुंचे। आयोजन की खास बात यह रही कि पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और ओडिशा समेत आसपास के कई जिलों से भी समाज के लोग गुडुंम पहाड़ पहुंचे।
पूरे क्षेत्र में सुबह से ही चहल-पहल देखने को मिली। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की गई। आयोजन में आदिवासी समाज की पारंपरिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण गुडुंम पहाड़ का पूरा क्षेत्र आस्था और सामाजिक एकजुटता के रंग में नजर आया।
समाज के लोगों का कहना है कि गुडुंम पहाड़ में होने वाला यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा कार्यक्रम नहीं है, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और पूर्वजों की परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पेन पुरखा की पूजा के माध्यम से समाज अपने पूर्वजों को स्मरण करता है और अपनी पारंपरिक मान्यताओं को आगे बढ़ाने का संदेश देता है।
आयोजन में शामिल लोगों ने कहा कि आधुनिक समय में भी अपनी पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना जरूरी है। गुडुंम पहाड़ में हर वर्ष होने वाला यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है।
बंडा परगना के 44 गांवों के साथ महाराष्ट्र और ओडिशा समेत विभिन्न क्षेत्रों से लोगों की मौजूदगी ने इस आयोजन को और व्यापक बना दिया। आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता के इस संगम ने गुडुंम पहाड़ को एक बार फिर आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत के प्रमुख केंद्र के रूप में सामने रखा।