‘सपनों को पंख देती मां!’ दिव्यांग बेटे को पीठ पर बैठाकर 10 किमी दूर स्कूल पहुंचाती है मां

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के दर्शीला गांव की मां अपने दिव्यांग बेटे राजकुमार जायसवाल को पढ़ाने के लिए हर दिन करीब 10 किलोमीटर का सफर तय करती है। चलने-फिरने में असमर्थ राजकुमार को मां अपनी पीठ पर बैठाकर बस स्टैंड तक ले जाती है, फिर स्कूल के पास उतरकर दोबारा पीठ पर बैठाकर विद्यालय पहुंचाती है। इतना ही नहीं, मां पूरे दिन स्कूल परिसर में रहकर बेटे की जरूरतों का ध्यान रखती है। परिवार और स्थानीय लोग अब राजकुमार के लिए इलेक्ट्रिक ट्राई-साइकिल की मांग कर रहे हैं।

Sep 8, 2026 - 10:50
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‘सपनों को पंख देती मां!’ दिव्यांग बेटे को पीठ पर बैठाकर 10 किमी दूर स्कूल पहुंचाती है मां

UNITED NEWS OF ASIA. शहडोल l मां की ममता और उसके त्याग की मिसाल शहडोल जिले के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से सामने आई है। यहां एक मां अपने दिव्यांग बेटे की पढ़ाई का सपना पूरा करने के लिए हर दिन खुद उसका सहारा बन रही है। बेटे के पैरों ने भले ही उसका साथ नहीं दिया, लेकिन मां ने उसकी पढ़ाई और सपनों के रास्ते में किसी तरह की बाधा नहीं आने दी।

आदिवासी बहुल शहडोल जिले के झिक बिजुरी क्षेत्र के दर्शीला गांव निवासी राजकुमार जायसवाल कक्षा 12वीं का छात्र है। राजकुमार शारीरिक रूप से दिव्यांग है और चलने-फिरने में असमर्थ है। उसका स्कूल शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झिक बिजुरी में है, जो उसके घर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित है।

हर दिन पीठ पर बैठाकर स्कूल पहुंचाती है मां

राजकुमार के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं है। ऐसे में उसकी मां रोजाना उसे अपनी पीठ पर बैठाकर घर से बस स्टैंड तक ले जाती है। इसके बाद दोनों बस से स्कूल के नजदीक पहुंचते हैं। बस से उतरने के बाद स्कूल तक का रास्ता भी मां अपने बेटे को पीठ पर बैठाकर तय करती है।

करीब 10 किलोमीटर की यह यात्रा रोजाना करना मां के लिए आसान नहीं है। इसके बावजूद बेटे की पढ़ाई के प्रति लगन और उसके भविष्य को लेकर मां का संकल्प इस कठिनाई पर भारी पड़ता है। मौसम कैसा भी हो, मां-बेटे की यह दिनचर्या लगातार जारी है।

स्कूल छोड़कर घर नहीं लौटती मां

राजकुमार की मां की जिम्मेदारी केवल उसे स्कूल तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है। वह बेटे को स्कूल छोड़ने के बाद वापस घर नहीं जाती, बल्कि पूरे दिन स्कूल परिसर में रहकर उसका इंतजार करती है। पढ़ाई के दौरान राजकुमार को किसी तरह की जरूरत पड़े तो वह तुरंत उसकी मदद कर सके, इसलिए मां दिनभर विद्यालय परिसर में मौजूद रहती है।

मां के इस समर्पण को देखकर स्कूल के शिक्षक और साथी छात्र भी प्रभावित हैं। राजकुमार की पढ़ाई के प्रति इच्छा और उसकी मां की मेहनत ने आसपास के लोगों का ध्यान खींचा है।

बेटे को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है मां

राजकुमार की मां की सबसे बड़ी इच्छा है कि उसका बेटा पढ़-लिखकर भविष्य में आत्मनिर्भर बने। वह चाहती है कि शिक्षा के जरिए राजकुमार अपने पैरों पर खड़ा हो और आगे चलकर किसी दूसरे पर निर्भर न रहे।

हालांकि रोजाना बेटे को पीठ पर बैठाकर लंबा सफर तय करना मां के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है। इसी वजह से परिवार और स्थानीय लोग शासन-प्रशासन से राजकुमार के लिए इलेक्ट्रिक ट्राई-साइकिल उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं। इससे राजकुमार की स्कूल तक पहुंच आसान हो सकती है और उसकी मां को भी रोजाना की शारीरिक परेशानी से राहत मिल सकती है।

यह कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति लगन और मां के उस समर्पण की है, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए हर मुश्किल का सामना करने का हौसला रखती है।