एर्राबोर पोटाकेबिन आश्रम दुष्कर्म मामला: हाईकोर्ट ने सजा में संशोधन कर आरोपी को 20 साल की कठोर कैद दी
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बस्तर के एर्राबोर पोटाकेबिन आश्रम दुष्कर्म मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले में संशोधन करते हुए आरोपी की सजा उम्रकैद से घटाकर 20 साल की कठोर कैद कर दी है, जबकि अन्य सजाएं बरकरार रखी गई हैं।
UNITED NEWS OF ASIA. बस्तर l बस्तर के चर्चित एर्राबोर पोटाकेबिन आश्रम दुष्कर्म मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई “मृत्यु तक उम्रकैद” की सजा में आंशिक संशोधन करते हुए आरोपी को 20 वर्ष की कठोर कैद की सजा सुनाई है। हालांकि, अन्य धाराओं के तहत दी गई सजा और दोषसिद्धि को यथावत रखा गया है।
यह मामला 22 जुलाई 2023 का है, जब बस्तर के एर्राबोर स्थित पोटाकेबिन आश्रम में रह रही लगभग 6 वर्ष 10 महीने की बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थी। पीड़िता की मां ने 24 जुलाई को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसमें बताया गया कि बच्ची रात में अपने कमरे से गायब हो गई थी और बाद में मिलने पर उसने दर्द की शिकायत करते हुए घटना का खुलासा किया।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी माडवी हिडमा उर्फ सोनू उर्फ राजू को गिरफ्तार किया। आरोपी पोटाकेबिन आश्रम के स्टाफ क्वार्टर में रहता था। मेडिकल जांच और गवाहों के बयान के आधार पर उसके खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं—450, 363, 366, 324 और 376—के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट 2012 की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने सभी साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत “जीवन पर्यंत कारावास” (मृत्यु तक कैद) की सजा सुनाई थी, साथ ही अन्य धाराओं के तहत अलग-अलग सजा भी दी थी। सभी सजाओं को एक साथ चलाने का आदेश दिया गया था।
इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत न्यूनतम सजा 20 वर्ष की कठोर कैद है, जिसे परिस्थितियों के आधार पर बढ़ाकर उम्रकैद किया जा सकता है।
कोर्ट ने मामले के तथ्यों, पीड़िता की उम्र, उपलब्ध साक्ष्यों और अपराध की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह माना कि 20 वर्ष की कठोर कैद इस मामले में न्यायसंगत होगी। इसलिए उम्रकैद की सजा को घटाकर 20 साल की कैद कर दिया गया। हालांकि, जुर्माना और अन्य धाराओं के तहत दी गई सजा को बरकरार रखा गया है।
यह फैसला न्यायिक संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें कानून के प्रावधानों और मामले की परिस्थितियों दोनों को ध्यान में रखा गया।
कुल मिलाकर, यह निर्णय यह दर्शाता है कि न्यायालय गंभीर अपराधों में सख्त रुख अपनाते हुए भी सजा के निर्धारण में कानूनी मानकों और तथ्यों का संतुलन बनाए रखता है।