छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: यौन शोषण पीड़िता को गर्भसमापन की अनुमति

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मानसिक रूप से दिव्यांग यौन शोषण पीड़िता को गर्भसमापन (MTP) की अनुमति दी है। कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और कानून के प्रावधानों के आधार पर यह फैसला सुनाया।

Apr 22, 2026 - 18:47
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: यौन शोषण पीड़िता को गर्भसमापन की अनुमति

UNITED NEWS OF ASIA. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए यौन शोषण की शिकार मानसिक रूप से दिव्यांग युवती को गर्भसमापन (अबॉर्शन) की अनुमति दे दी है। यह निर्णय न केवल कानून के दायरे में लिया गया है, बल्कि पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए न्यायिक संवेदनशीलता का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है।

यह मामला उस समय सामने आया जब यौन शोषण के कारण पीड़िता गर्भवती हो गई थी। इसके बाद पीड़िता की ओर से कोर्ट में गर्भसमापन की अनुमति के लिए याचिका दायर की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने पहले सुनवाई में मेडिकल जांच कराने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट ने कांकेर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को निर्देश दिया था कि वे विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम गठित करें, जिसमें एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) शामिल हो। इस टीम को पीड़िता की शारीरिक और मानसिक स्थिति, गर्भावस्था की अवस्था और गर्भसमापन से होने वाले संभावित जोखिमों का विस्तृत मूल्यांकन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।

मेडिकल रिपोर्ट पेश होने के बाद मामले की दोबारा सुनवाई हुई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध मेडिकल रिपोर्ट और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 (MTP Act) के प्रावधानों के साथ-साथ पूर्व में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी मिसालों को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट है कि पीड़िता को इस अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके लिए गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान का कारण बन सकता है।

इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए गर्भसमापन की अनुमति प्रदान कर दी। साथ ही, कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पीड़िता अपने अभिभावक या रिश्तेदार के साथ CMHO, कांकेर के समक्ष उपस्थित हो, जहां सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए सुरक्षित तरीके से गर्भसमापन किया जाए।

कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश दिए कि पूरी प्रक्रिया कम से कम दो विशेषज्ञ डॉक्टरों, जिनमें एक गायनेकोलॉजिस्ट शामिल हो, की निगरानी में की जाए। इसके अलावा, भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं, ताकि आपराधिक मामले की जांच में साक्ष्य के रूप में इसका उपयोग किया जा सके।

यह फैसला महिला अधिकारों, न्याय और संवेदनशीलता के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इससे यह संदेश भी जाता है कि न्यायालय पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना बेहद आवश्यक है।

कुल मिलाकर, यह निर्णय न्यायपालिका की संवेदनशीलता और कानून के प्रभावी उपयोग का एक सशक्त उदाहरण है, जो भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है।