दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: अवैध निर्माण से प्रभावित नहीं तो अदालत का दरवाजा मत खटखटाएं

दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध निर्माण से सीधे प्रभावित नहीं होने वाले लोगों द्वारा याचिकाएं दायर करने पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक समय बर्बाद होता है और जरूरत पड़ने पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

Jan 2, 2026 - 12:34
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दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: अवैध निर्माण से प्रभावित नहीं तो अदालत का दरवाजा मत खटखटाएं

UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में अवैध निर्माण से संबंधित याचिकाओं के दुरुपयोग पर कड़ी चेतावनी जारी की है। जस्टिस मिनी पुष्करणा की बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल वही व्यक्ति याचिका दायर करने का हकदार है, जो कथित अवैध या गैरकानूनी निर्माण से सीधे प्रभावित हो। अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं है और उसके कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ है, तो ऐसी याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानी जाएंगी।

कोर्ट ने यह टिप्पणी पूर्वी दिल्ली के अंगद नगर स्थित 120 गज के एक प्लॉट पर कथित गैरकानूनी निर्माण को ढहाने की मांग वाली याचिका खारिज करने के दौरान की। जांच में यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता न तो संपत्ति में रहता है और न ही उसके आसपास निवास करता है। एमसीडी और पुलिस ने याचिकाकर्ता को तलाशने की कोशिश की, लेकिन वह अपने बताए पते पर मौजूद नहीं मिला।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में याचिकाएं केवल न्यायालय का समय बर्बाद करती हैं और वास्तविक प्रभावित लोगों की सुनवाई में देरी करती हैं। बेंच ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

जस्टिस पुष्करणा की बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि किसी निर्माण कार्य से पड़ोसी व्यक्ति सीधे प्रभावित हो रहा है, जैसे कि उसकी हवा या रोशनी बाधित हो रही हो, तभी वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। अन्यथा, ऐसे फिजूल के दावे अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में एमसीडी और अन्य सरकारी एजेंसियां पहले ही कार्रवाई करने के लिए मौजूद हैं और उन्हें अपने विवेक अनुसार कदम उठाने की पूरी स्वतंत्रता है। बेंच ने फिजूल याचिकाओं को एक संभावित तरीके के रूप में देखा, जिससे अवैध वसूली या दबाव बनाने का गैरकानूनी धंधा चल सकता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों का उपयोग केवल वास्तविक और प्रत्यक्ष पीड़ा की स्थिति में ही किया जा सकता है। जनता को यह संदेश दिया गया कि अनावश्यक हस्तक्षेप, निजी स्वार्थ या दबाव बनाने के लिए न्यायालय का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, और केवल वही व्यक्ति न्याय की गुहार लगा सकता है जो वास्तविक रूप से प्रभावित हो।

इस फैसले के जरिए दिल्ली हाईकोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का सही और प्रभावी उपयोग हो और अदालत का समय केवल वास्तविक जरूरतों के लिए बचे।