शादी होने से खत्म नहीं होता POCSO एक्ट, हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज की

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी युवक को राहत देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कथित अपराध के समय शिकायतकर्ता नाबालिग थी, तो बाद में दोनों की शादी हो जाना और साथ रहना कथित अपराध को खत्म नहीं करता। अदालत ने कहा कि शुरुआती स्तर पर FIR, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।

Aug 19, 2026 - 13:53
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शादी होने से खत्म नहीं होता POCSO एक्ट, हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज की

UNITED NEWS OF ASIA.  बिलासपुर l बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट से जुड़े एक मामले में आरोपी युवक को राहत देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कथित अपराध के समय शिकायतकर्ता नाबालिग थी, तो बाद में दोनों का विवाह हो जाना और साथ रहना कथित POCSO अपराध को समाप्त नहीं करता। अदालत ने FIR, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग को स्वीकार नहीं किया।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। मामला जांजगीर-चांपा जिले के रहने वाले नवल किशोर आदित्य से जुड़ा है। उसके खिलाफ महिला थाने में 22 अप्रैल 2026 को अपराध दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता वर्ष 2011 से आरोपी के संपर्क में थी और आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। शिकायत के अनुसार आरोपी परिवार की वजह बताकर शादी को टालता रहा।

बाद में दोनों ने 20 अप्रैल 2026 को शादी कर ली। पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद 16 जून को चार्जशीट पेश की। इसके बाद 19 जून को विशेष POCSO अदालत ने मामले का संज्ञान लिया। इसके बाद आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग की गई।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि दोनों लंबे समय से एक-दूसरे के संपर्क में थे और बाद में उन्होंने शादी कर ली। यह भी बताया गया कि शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष मामले को गलतफहमी का परिणाम बताते हुए आगे की कार्रवाई नहीं चाहने की बात कही थी। आरोपी पक्ष ने इसी आधार पर आपराधिक कार्यवाही खत्म करने की मांग की।

राज्य की ओर से याचिका का विरोध किया गया। सरकारी पक्ष ने अदालत के सामने तर्क रखा कि कथित संबंध की शुरुआत के समय शिकायतकर्ता नाबालिग थी। ऐसे में बाद में हुआ विवाह या दोनों के बीच हुआ समझौता POCSO कानून के तहत कथित अपराध की कानूनी स्थिति को समाप्त नहीं कर सकता। राज्य ने मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की आवश्यकता बताई।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में हुआ विवाह और साथ रहना मामले की परिस्थितियों में प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर शुरुआती स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को खत्म नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि BNSS की धारा 528 के तहत याचिका पर सुनवाई करते समय विवादित तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन कर मिनी ट्रायल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए FIR, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया।

इस तरह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नवल किशोर आदित्य की याचिका खारिज कर दी। अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट है कि कथित POCSO अपराध के समय पीड़ित के नाबालिग होने की स्थिति में बाद की शादी अपने आप आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती।