जयशंकर का बड़ा बयान, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता से बदल रहा वैश्विक शक्ति संतुलन

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा कि भारत समेत उभरती शक्तियां रणनीतिक स्वायत्तता, आत्मनिर्भरता और विविध साझेदारियों पर जोर दे रही हैं। क्वाड, ब्रिक्स और विभिन्न कनेक्टिविटी परियोजनाओं को उन्होंने बदलते वैश्विक ढांचे के उदाहरण के रूप में बताया।

Oct 4, 2026 - 19:43
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जयशंकर का बड़ा बयान, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता से बदल रहा वैश्विक शक्ति संतुलन

UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलाव का प्रमुख कारण बताया है। 62वें म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में वैश्विक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए जयशंकर ने कहा कि दुनिया अब ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां अमेरिकी शक्ति में बदलाव, चीन का लगातार बढ़ता प्रभाव और उभरती मध्यम शक्तियों की बढ़ती आत्मनिर्भरता अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नया स्वरूप दे रही है।

जयशंकर के अनुसार वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को समझने के लिए अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को प्रमुखता से देखना होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका की वैश्विक भूमिका और शक्ति में हो रहे बदलाव मौजूदा परिस्थितियों का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं। वहीं चीन का आर्थिक और रणनीतिक उदय वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला दूसरा बड़ा कारक है।

विदेश मंत्री ने चीन की आर्थिक ताकत का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई है। चीन की आर्थिक क्षमता अब उसके राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव में भी दिखाई दे रही है। इसके चलते दुनिया के कई देश अपनी विदेश और आर्थिक नीतियों में नए विकल्प तलाश रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत सहित कई उभरती और मध्यम आर्थिक शक्तियां अब अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर अधिक सजग हैं। ये देश रणनीतिक स्वायत्तता, आत्मनिर्भरता, मजबूत सप्लाई चेन और जोखिम कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर देश किसी एक शक्ति या एक व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने लिए अलग-अलग विकल्प तैयार कर रहे हैं।

जयशंकर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए सभी देशों के बीच हर मुद्दे पर पूर्ण सहमति होना जरूरी नहीं है। यदि अलग-अलग देशों के बीच पर्याप्त साझा हित मौजूद हैं, तो वे मतभेदों के बावजूद साथ मिलकर काम कर सकते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में क्वाड और ब्रिक्स जैसे मंचों का उदाहरण दिया।

विदेश मंत्री ने कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियां एक-दूसरे के साथ सहयोग करने के साथ अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रख सकती हैं। यह तभी संभव है, जब उनके मूल हितों में सीधा टकराव न हो। भारत की विदेश नीति में विभिन्न देशों और समूहों के साथ समानांतर संबंध इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।
जयशंकर ने भारत और अन्य देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने वाली विभिन्न परियोजनाओं का भी उल्लेख किया। इनमें इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और नॉर्दर्न सी रूट शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाएं वैश्विक व्यापार, संपर्क और आर्थिक सहयोग के नए रास्ते तैयार कर रही हैं।

उन्होंने इंटरनेशनल सोलर अलायंस और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी भारत की अगुवाई वाली पहलों का भी जिक्र किया। जयशंकर के मुताबिक, इन पहलों के जरिए भारत वैश्विक चुनौतियों के समाधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में अपनी भूमिका को मजबूत कर रहा है।

विदेश मंत्री के बयान से स्पष्ट है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में केवल बड़ी शक्तियां ही निर्णायक भूमिका नहीं निभा रही हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाएं और मध्यम शक्तियां भी अपने राष्ट्रीय हितों, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय सहयोग के जरिए वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।