108 कुंडीय महायज्ञ का भव्य समापन: बसना में भक्ति का महासागर, भावुक हुए विधायक डॉ. संपत अग्रवाल
बसना विधानसभा क्षेत्र के ग्राम अंशुला में आयोजित श्री श्री 108 एकादश कुंडीय श्रीमन महा गणेश महायज्ञ का समापन 5 नवंबर को भव्य रूप से हुआ। विधायक डॉ. संपत अग्रवाल ने इसे क्षेत्र की धार्मिक एकता और भक्ति का प्रतीक बताया। समापन अवसर पर संतों के पलायन से वे भावुक हो उठे।
UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, बसना/अंशुला। बसना विधानसभा क्षेत्र के ग्राम अंशुला में आयोजित श्री श्री 108 एकादश कुंडीय श्रीमन महा गणेश महायज्ञ का भव्य समापन 5 नवंबर को हुआ। इस ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन ने पूरे क्षेत्र को भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित कर दिया। समापन समारोह कथा वाचन, विशाल हवन और महाभंडारे के साथ सम्पन्न हुआ, जिसमें हजारों भक्तों और संतों ने भाग लिया।
विधायक डॉ. संपत अग्रवाल ने इस अवसर पर कहा कि यह महायज्ञ क्षेत्र की आत्मा और एकता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि “यह आयोजन सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला अध्यात्मिक उत्सव है, जिसने जनमानस को नई ऊर्जा और सद्भाव का संदेश दिया।”
समापन के अवसर पर 100 से अधिक यज्ञ कुंड बनाए गए थे, जिनमें हजारों भक्तों ने पूर्ण श्रद्धा के साथ आहुति दी और पुण्य लाभ प्राप्त किया। पूरे परिसर में भक्ति का माहौल व्याप्त था। यज्ञ स्थल पर संतों और साधु-महात्माओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को कुंभ जैसा स्वरूप प्रदान किया।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि यह महायज्ञ क्षेत्र की धार्मिक एकता और आस्था का प्रतीक है। उन्होंने महाभंडारे की प्रशंसा करते हुए बताया कि प्रतिदिन की तरह ही अंतिम दिन भी भक्तों के लिए विशाल भंडारे की व्यवस्था की गई थी, जिसमें खीर-पूरी सहित अनेक प्रसाद वितरित किए गए।
विधायक डॉ. संपत अग्रवाल ने समापन अवसर पर जनता और आयोजकों के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में प्रेम, श्रद्धा और समरसता के भाव को बढ़ाते हैं।
कार्यक्रम के अंत में जब साधु-संतों का पलायन प्रारंभ हुआ तो विधायक डॉ. अग्रवाल भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि संतों की उपस्थिति ने इस आयोजन को दिव्यता प्रदान की, और उनके जाने से मन में एक खालीपन का एहसास हुआ। उनकी आंखें नम हो गईं, जो उनके भीतर की गहरी धार्मिक भावना और संतों के प्रति सम्मान का प्रतीक था।
बसना का यह 108 कुंडीय महायज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का पर्व बन गया, जिसने समूचे क्षेत्र में भक्ति और श्रद्धा की अविरल धारा प्रवाहित कर दी।