विश्व स्तनपान सप्ताह से पहले यूनिसेफ की मीडिया कार्यशाला, स्वस्थ आहार और स्तनपान पर जागरूकता बढ़ाने पर जोर

विश्व स्तनपान सप्ताह से पहले रायपुर में यूनिसेफ ने मीडिया कार्यशाला आयोजित कर पत्रकारों को स्तनपान, मातृ एवं शिशु पोषण तथा स्वस्थ आहार पर वैज्ञानिक और तथ्यपरक रिपोर्टिंग के महत्व से अवगत कराया। विशेषज्ञों ने कहा कि मीडिया समाज में सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

Jul 24, 2026 - 11:33
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विश्व स्तनपान सप्ताह से पहले यूनिसेफ की मीडिया कार्यशाला, स्वस्थ आहार और स्तनपान पर जागरूकता बढ़ाने पर जोर

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l विश्व स्तनपान सप्ताह के पूर्व मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा पोषण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से यूनिसेफ ने रायपुर में "विश्व स्तनपान सप्ताह एवं स्वस्थ आहार" विषय पर एक विशेष मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया। होटल सयाजी में आयोजित इस कार्यशाला में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य मीडिया को वैज्ञानिक तथ्यों और प्रमाण आधारित जानकारी से जोड़ते हुए स्तनपान, स्वस्थ आहार और पोषण संबंधी विषयों पर जिम्मेदार एवं प्रभावी रिपोर्टिंग के लिए प्रेरित करना था।

कार्यशाला की शुरुआत कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट अनिल गुलाटी के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि मीडिया केवल समाचारों का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की महत्वपूर्ण शक्ति भी है। यदि पत्रकार वैज्ञानिक तथ्यों और प्रमाण आधारित जानकारी के साथ पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी विषयों को लोगों तक पहुंचाते हैं, तो इससे समाज में फैली गलत धारणाओं को दूर करने में मदद मिलेगी और परिवार स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। उन्होंने कहा कि हर बच्चे को जीवन की स्वस्थ शुरुआत दिलाने में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

न्यूट्रिशन स्पेशलिस्ट डॉ. अपर्णा देशपांडे ने स्तनपान के महत्व पर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि मां का दूध नवजात शिशु के लिए सबसे सुरक्षित, संपूर्ण और सर्वोत्तम आहार है। जीवन के पहले छह महीनों तक केवल मां का दूध ही शिशु की सभी पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करता है। इससे शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और उसके शारीरिक तथा मानसिक विकास की मजबूत नींव पड़ती है।

उन्होंने कहा कि सफल स्तनपान केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे परिवार और समाज का सामूहिक दायित्व है। गर्भावस्था से लेकर स्तनपान की पूरी अवधि तक महिला को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है। इस दौरान पति, परिवार के अन्य सदस्य और समुदाय का सहयोग मां के आत्मविश्वास को बढ़ाता है तथा स्तनपान को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कार्यशाला के दौरान आईएमएस अधिनियम, 1992 के बारे में भी जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि यह कानून स्तनपान को बढ़ावा देने तथा शिशु दूध विकल्पों और व्यावसायिक बेबी फूड के अनुचित प्रचार-प्रसार को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक उत्पादों का अनावश्यक प्रचार स्तनपान की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इस विषय पर मीडिया को विशेष संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ रिपोर्टिंग करनी चाहिए।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के उप संचालक (बाल स्वास्थ्य) डॉ. बी.आर. भगत ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और एएनएम के माध्यम से गर्भवती महिलाओं तथा धात्री माताओं को स्तनपान, पूरक आहार और पोषण संबंधी नियमित परामर्श दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को जीवन की शुरुआत से ही बेहतर पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

कार्यशाला में स्वस्थ आहार पर भी विस्तार से चर्चा हुई। कंसल्टेंट आस्था सिंह ने कहा कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध ताजा और घर का बना भोजन सबसे पौष्टिक और सुरक्षित विकल्प है। उन्होंने लोगों को जंक फूड तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि किसी भी खाद्य उत्पाद को खरीदने से पहले उसके न्यूट्रिशन लेबल को ध्यान से पढ़ना चाहिए ताकि उसमें मौजूद पोषक तत्वों और अन्य सामग्रियों की सही जानकारी मिल सके।

उन्होंने दैनिक भोजन को अधिक पौष्टिक बनाने के लिए कई सरल और व्यवहारिक उपाय भी साझा किए। उनके अनुसार छोटे-छोटे बदलाव, जैसे अधिक ताजे फल और सब्जियों का सेवन, मोटे अनाज को भोजन में शामिल करना, मीठे पेय पदार्थों की जगह सादा पानी या प्राकृतिक पेय का उपयोग तथा पैकेज्ड स्नैक्स के स्थान पर घर में बने पौष्टिक नाश्ते को अपनाना, लोगों के स्वास्थ्य में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों और विशेषज्ञों के बीच खुला संवाद भी आयोजित किया गया, जिसमें स्तनपान, पूरक आहार, मातृ पोषण, बच्चों के संतुलित आहार तथा समाज में फैली विभिन्न भ्रांतियों पर चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने इस बात पर भी विचार साझा किए कि मीडिया प्रमाण आधारित पत्रकारिता के माध्यम से लोगों तक सही जानकारी पहुंचाकर स्वस्थ व्यवहार को बढ़ावा देने में कैसे प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में स्वास्थ्य संबंधी गलत और भ्रामक जानकारियां तेजी से फैलती हैं। ऐसे समय में पत्रकारों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे किसी भी जानकारी को प्रकाशित या प्रसारित करने से पहले उसके वैज्ञानिक आधार की पुष्टि करें। इससे समाज में भ्रम की स्थिति कम होगी और लोग सही निर्णय लेने के लिए प्रेरित होंगे।

कार्यशाला के समापन पर यूनिसेफ ने कहा कि मातृ एवं शिशु पोषण में सुधार केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग, समुदाय, परिवार, स्वयंसेवी संस्थाओं और मीडिया के बीच मजबूत समन्वय आवश्यक है। जिम्मेदार और तथ्यपरक पत्रकारिता के माध्यम से स्तनपान को सामान्य सामाजिक व्यवहार बनाया जा सकता है तथा स्वस्थ आहार के प्रति व्यापक जनजागरूकता पैदा की जा सकती है।

यूनिसेफ ने यह भी दोहराया कि 1 से 7 अगस्त तक मनाए जाने वाले विश्व स्तनपान सप्ताह का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को जीवन की बेहतर शुरुआत दिलाना और प्रत्येक मां को स्तनपान के लिए आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराना है। संस्था ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, संतुलित पोषण और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने के लिए सभी हितधारकों के साथ मिलकर निरंतर कार्य करने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।