पेट्रोल में कितना इथेनॉल है, नहीं जान पाएंगे ग्राहक! E20 पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

E20 पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बताने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता ने पेट्रोल पंपों के डिस्पेंसिंग नोजल और बिल या रसीद पर इथेनॉल का सटीक प्रतिशत दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने को कहा है। E20 पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण होता है। इसके इस्तेमाल को लेकर वाहन की माइलेज, ईंधन सिस्टम और पुराने वाहनों पर संभावित असर को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

Aug 31, 2026 - 15:00
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पेट्रोल में कितना इथेनॉल है, नहीं जान पाएंगे ग्राहक! E20 पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

UNITED NEWS OF ASIA. देश में E20 पेट्रोल को लेकर जारी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोल में इथेनॉल की वास्तविक मात्रा बताने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। याचिका में मांग की गई थी कि पेट्रोल पंपों पर ग्राहकों को बेचे जाने वाले पेट्रोल में इथेनॉल का सटीक प्रतिशत बताया जाए। इसके अलावा पेट्रोल के बिल, चालान या रसीद पर भी इथेनॉल की मात्रा दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने को कहा है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एनके गोस्वामी ने पेट्रोल की रसीद का हवाला देते हुए कहा कि उसमें इथेनॉल की मात्रा का कोई उल्लेख नहीं होता है। उनका तर्क था कि ग्राहक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह किस तरह का ईंधन खरीद रहा है। उन्होंने पिछली सुनवाई में अटॉर्नी जनरल की ओर से E20 को लेकर प्रयोग का उल्लेख किए जाने की बात भी उठाई और सरकार से इस संबंध में हलफनामा देने की मांग की।

मामले में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि भारत सरकार की ओर से जवाब दिया जाना चाहिए। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जानकारी सिर्फ उन्हें नहीं बल्कि देश के सभी नागरिकों को मिलनी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने के बजाय याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट का रुख करने की सलाह दी।

याचिका में मांग की गई थी कि प्रत्येक पेट्रोल डिस्पेंसिंग नोजल पर इथेनॉल की सटीक मात्रा का खुलासा किया जाए। इसके साथ ही ईंधन खरीदने वाले ग्राहकों को बिल या रसीद के माध्यम से भी यह जानकारी उपलब्ध कराई जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि वे अपने वाहन में किस प्रकार का ईंधन इस्तेमाल कर रहे हैं।

E20 पेट्रोल को लेकर देश में पहले से ही चर्चा चल रही है। E20 का मतलब ऐसे पेट्रोल से है जिसमें 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाया जाता है और बाकी हिस्सा पेट्रोल होता है। सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाना और ईंधन क्षेत्र से जुड़े उत्सर्जन को कम करना है।

हालांकि E20 के इस्तेमाल को लेकर वाहन मालिकों के बीच कई सवाल भी उठे हैं। कुछ वाहन मालिकों और विशेषज्ञों की ओर से पुराने वाहनों की माइलेज और ईंधन प्रणाली पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है। खास तौर पर E20 के व्यापक इस्तेमाल के बाद पुराने वाहनों के प्रदर्शन और अनुकूलता को लेकर बहस तेज हुई है।

E20 के कारण वाहनों में माइलेज कम होने, ईंधन सिस्टम पर असर पड़ने या कुछ पुराने वाहनों में तकनीकी समस्या आने के दावे भी सामने आते रहे हैं। दूसरी ओर वाहन कंपनियों ने E20 अनुकूल वाहनों और इंजनों को विकसित किया है। ऐसे में वाहन की उम्र, इंजन की तकनीक और निर्माता की ओर से दी गई ईंधन संबंधी जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है।

रिपोर्ट में रायपुर की एक उपभोक्ता अदालत के मामले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें एक वाहन मालिक की शिकायत के बाद मारुति सुजुकी को नई ग्रैंड विटारा कार उपलब्ध कराने का आदेश दिए जाने की बात कही गई है। हालांकि इस तरह के मामलों और E20 से वाहन में हुई कथित खराबी के बीच संबंध को लेकर अलग-अलग दावे हैं और हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख के बाद पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा को बिल या पेट्रोल पंप के डिस्पेंसिंग नोजल पर स्पष्ट रूप से दर्ज कराने की मांग को लेकर आगे की कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट में जा सकती है। फिलहाल शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इससे E20 पेट्रोल की संरचना और उपभोक्ताओं को मिलने वाली जानकारी को लेकर बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।