अंधविश्वास ने छीनी तीन जिंदगियाँ: धनोरा गाँव में एक ही परिवार के तीन बच्चों की दर्दनाक मौत

छत्तीसगढ़ के मैनपुर ब्लॉक के धनोरा गांव में अंधविश्वास, झोलाछापों पर भरोसे और इलाज में देरी ने एक ही परिवार के तीन मासूमों की तीन दिनों में जान ले ली। स्वास्थ्य सेवाओं की दूरी, एंबुलेंस की देरी और डॉक्टरों की कमी ने भी इस त्रासदी को और गहरा बना दिया।

Nov 17, 2025 - 15:37
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अंधविश्वास ने छीनी तीन जिंदगियाँ: धनोरा गाँव में एक ही परिवार के तीन बच्चों की दर्दनाक मौत

 UNITED NEWS OF ASIA.  गरियाबंद | छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक के धनोरा गांव से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। तीन दिनों के भीतर एक ही परिवार के तीन मासूम बच्चों की मौत ने न केवल गाँव बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। यह त्रासदी बीमारी से कम और अंधविश्वास, इलाज में देरी तथा झोलाछापों पर अंधभरोसे से अधिक जुड़ी हुई है। जानकारी के अनुसार धनोरा निवासी डमरूधर नागेश का परिवार कुछ दिन पहले साहिबिन कछार में मक्का तोड़ने गया था। इसी दौरान आठ, सात और चार वर्ष के तीनों बच्चों को तेज बुखार हुआ। हालात बिगड़ते गए, लेकिन परिवार ने अस्पताल जाने की बजाय झोलाछाप “डॉक्टरों” और बैगा–गुनिया पर भरोसा किया, जिसके कारण कीमती समय हाथ से निकल गया।

पहली घटना 11 नवंबर की है, जब परिवार की आठ साल की बच्ची की हालत अचानक गंभीर हो गई। परिजन उसे लेकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और बच्ची ने दम तोड़ दिया। इस घटना के दो दिन बाद, 13 नवंबर को सात साल के बेटे की तबीयत खराब हुई। परिजन उसे देवभोग अस्पताल ले जा रहे थे, पर रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। परिवार अभी इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि उसी शाम चार साल के सबसे छोटे बेटे को तेज बुखार और बेचैनी ने घेर लिया। इसके बावजूद परिवार उसे अस्पताल नहीं ले गया बल्कि जंगल के एक बैगा के पास झाड़–फूँक कराने पहुंच गया। घंटों चली इस कुप्रथा के बीच मासूम ने वहीं दम तोड़ दिया।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी लगातार परिवार को समझाते रहे, मितानिनों ने कई बार अस्पताल चलने की सलाह दी, यहाँ तक कि बच्चों का मलेरिया टेस्ट भी किया गया जो नेगेटिव आया। लेकिन अंधविश्वास और झोलाछापों पर दृढ़ भरोसा परिवार को अस्पताल तक पहुँचने से रोकता रहा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि धनोरा और आसपास के गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दूर होने और एंबुलेंस के देर से पहुँचने के कारण लोग अक्सर झोलाछापों और बैगा–गुनिया पर निर्भर हो जाते हैं। कई बार डॉक्टर उपलब्ध न रहने के कारण भी ग्रामीणों का विश्वास सरकारी स्वास्थ्य तंत्र से उठ जाता है।

धनोरा की यह दिल दहला देने वाली घटना कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है—क्या आज भी गांवों में अंधविश्वास बच्चों की जिंदगियाँ छीन रहा है? क्या स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और संवेदनहीन व्यवस्था इन त्रासदियों को जन्म दे रही है? प्रशासन चाहे जितने दावे करे, लेकिन इस घटना ने साबित कर दिया कि जमीनी स्तर पर कई बदलाव तत्काल आवश्यक हैं।

यह त्रासदी चेतावनी है कि यदि जागरूकता, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और चिकित्सा तंत्र की विश्वसनीयता को मजबूत नहीं किया गया, तो ऐसी घटनाएँ आगे भी मासूम जिंदगियों को निगलती रहेंगी।