आधी आबादी का सवाल: मध्य प्रदेश में नारी शक्ति को किसने दिया ज्यादा प्रतिनिधित्व? विधानसभा से संसद तक बीजेपी-कांग्रेस का आंकलन
मध्य प्रदेश में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक दलों की स्थिति चर्चा में है। विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में बीजेपी और कांग्रेस द्वारा महिलाओं को दिए गए टिकट और भागीदारी का विश्लेषण कई अहम सवाल खड़े करता है।
UNITED NEWS OF ASIA. मध्य प्रदेश में महिला आरक्षण और नारी सशक्तिकरण को लेकर बहस तेज होती जा रही है। “आधी आबादी” को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के दावे अक्सर किए जाते हैं, लेकिन जब वास्तविक आंकड़ों पर नजर डाली जाती है, तो तस्वीर उतनी संतोषजनक नजर नहीं आती। खासतौर पर विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में महिलाओं की भागीदारी को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दल सवालों के घेरे में हैं।
मध्य प्रदेश विधानसभा की बात करें तो कुल सीटों के मुकाबले महिलाओं को मिलने वाले टिकट का प्रतिशत अभी भी सीमित है। चुनावों के दौरान दोनों प्रमुख दल—बीजेपी और कांग्रेस—महिलाओं को टिकट देने का दावा तो करते हैं, लेकिन यह संख्या अक्सर 10 से 15 प्रतिशत के बीच ही सिमट जाती है। कई बार यह देखा गया है कि सुरक्षित या कमजोर सीटों पर ही महिला उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाती है।
लोकसभा चुनावों में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। मध्य प्रदेश से चुने गए सांसदों में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है। हालांकि बीजेपी ने पिछले कुछ चुनावों में महिला उम्मीदवारों को थोड़ा अधिक अवसर दिया है, लेकिन कुल प्रतिनिधित्व के लिहाज से यह अभी भी संतुलित नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस भी इस मामले में बहुत आगे नहीं दिखती और दोनों दलों के बीच अंतर बहुत बड़ा नहीं है।
राज्यसभा में स्थिति कुछ हद तक बेहतर नजर आती है, जहां पार्टियां रणनीतिक तौर पर महिलाओं को मौका देती हैं। यहां नामांकन के जरिए महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की जाती है, लेकिन यह भी सीमित दायरे में ही रहता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण बिल की चर्चा के बावजूद जमीनी स्तर पर पार्टियों की इच्छाशक्ति पूरी तरह स्पष्ट नहीं दिखती। टिकट वितरण में महिलाओं को बराबरी का मौका देना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। कई बार यह भी देखा गया है कि महिलाओं को टिकट देने का फैसला सामाजिक समीकरण या राजनीतिक दबाव के आधार पर लिया जाता है, न कि समान अवसर की सोच से।
बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दल अपने-अपने स्तर पर महिला सशक्तिकरण के दावे करते हैं। बीजेपी “नारी शक्ति” को अपनी नीतियों का अहम हिस्सा बताती है, जबकि कांग्रेस भी महिलाओं के अधिकारों को लेकर कई घोषणाएं करती रही है। लेकिन आंकड़े यह संकेत देते हैं कि दोनों ही दलों को इस दिशा में और गंभीर प्रयास करने की जरूरत है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिला नेताओं की भागीदारी में भी अंतर देखा जाता है। पंचायत स्तर पर आरक्षण के कारण महिलाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन उच्च स्तर की राजनीति में यह अनुपात अभी भी कम है।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश में महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि वास्तव में “आधी आबादी” को बराबरी का हक देना है, तो राजनीतिक दलों को टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व के अवसर तक महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी।
आने वाले चुनावों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या बीजेपी और कांग्रेस अपने दावों को हकीकत में बदल पाते हैं या फिर यह मुद्दा केवल बहस तक ही सीमित रह जाता है।