मंगलयान की नहीं थी कोई योजना, रूस की असफल साझेदारी ने भारत को मंगल तक पहुंचाया; जानिए दिलचस्प कहानी
भारत का पहला मंगल मिशन मंगलयान किसी पूर्व निर्धारित योजना का हिस्सा नहीं था। चंद्रयान-2 के लिए रूस के साथ हुई साझेदारी टूटने के बाद ISRO ने तैयार हो रहे ऑर्बिटर हार्डवेयर का उपयोग मंगल मिशन के लिए करने का फैसला किया। सीमित समय और तकनीकी चुनौतियों के बीच 5 नवंबर 2013 को मंगलयान लॉन्च हुआ और 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचकर भारत ने अंतरिक्ष इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया।
UNITED NEWS OF ASIA. भारत का पहला मंगल मिशन मंगलयान देश के अंतरिक्ष इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। पांच नवंबर 2013 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने PSLV-C25 रॉकेट के जरिए मंगलयान को अंतरिक्ष में रवाना किया था। करीब तीन सौ दिनों की यात्रा के बाद चौबीस सितंबर 2014 को यह सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंच गया। लेकिन इस ऐतिहासिक मिशन की शुरुआत मंगल ग्रह तक पहुंचने की किसी पुरानी योजना से नहीं, बल्कि चंद्रयान-2 से जुड़ी एक मुश्किल परिस्थिति से हुई थी।
रूस के साथ चंद्रयान-2 की साझेदारी टूटी
साल 2011 के आसपास ISRO चंद्रयान-2 मिशन की तैयारी कर रहा था। इस मिशन में भारत को ऑर्बिटर तैयार करना था, जबकि लैंडर बनाने की जिम्मेदारी रूस के पास थी। लेकिन रूस के एक अन्य अंतरिक्ष मिशन में आई तकनीकी समस्याओं के कारण लैंडर के डिजाइन में बदलाव की जरूरत पड़ी। इससे चंद्रयान-2 की संयुक्त योजना प्रभावित हुई और आखिरकार रूस इस साझेदारी से अलग हो गया।
इस घटनाक्रम के बाद ISRO के सामने चुनौती थी कि आगे क्या किया जाए। भारत अपने स्तर पर लैंडर और रोवर तैयार कर सकता था, लेकिन इसके लिए कई साल लग सकते थे। दूसरी ओर चंद्रयान-2 के लिए ऑर्बिटर का हार्डवेयर तैयार किया जा रहा था। ऐसे में वैज्ञानिकों के सामने सवाल था कि क्या इस तैयार तकनीक का इस्तेमाल किसी दूसरे अंतरिक्ष मिशन में किया जा सकता है।
चंद्र मिशन से मंगल मिशन तक का सफर
ISRO के वैज्ञानिकों और नेतृत्व ने इस स्थिति को एक नए अवसर के रूप में देखा। मंगल ग्रह के लिए अनुकूल लॉन्च विंडो लगभग हर छब्बीस महीने में आती है। वर्ष 2013 के अंत में ऐसा ही एक अवसर उपलब्ध था। इसलिए चंद्रयान-2 के लिए तैयार हो रहे ऑर्बिटर के डिजाइन में बदलाव कर उसे मंगल मिशन के अनुकूल बनाने का फैसला लिया गया।
अगस्त 2012 में मंगल मिशन को औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के पास अंतरिक्ष यान को तैयार करने, परीक्षण करने और लॉन्च के लिए तैयार करने के लिए महज पंद्रह महीने का समय था। कम समय में मिशन को पूरा करना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।
तकनीकी चुनौतियों के बीच लॉन्च हुआ मंगलयान
मंगल ग्रह पृथ्वी से काफी दूर है। वहां से अंतरिक्ष यान तक संदेश पहुंचने और जवाब मिलने में समय लगता है। इसलिए मंगलयान को कई महत्वपूर्ण गतिविधियां स्वचालित रूप से करने में सक्षम बनाया गया। इसके अलावा PSLV रॉकेट की सीमित क्षमता के कारण अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर भेजने के लिए कई चरणों में सावधानीपूर्वक इंजन बर्न करने की जरूरत थी।
वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की मेहनत रंग लाई। पांच नवंबर 2013 को मंगलयान को सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। करीब तीन सौ दिनों की अंतरिक्ष यात्रा पूरी करने के बाद चौबीस सितंबर 2014 को यह मंगल की कक्षा में स्थापित हो गया। इसके साथ ही भारत अपने पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा तक पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बना।
छह महीने का मिशन साढ़े सात साल तक चला
मंगलयान को शुरुआत में छह महीने के प्रदर्शन मिशन के रूप में तैयार किया गया था, लेकिन इसने उम्मीद से कहीं अधिक समय तक काम किया। ईंधन के कुशल प्रबंधन और अंतरिक्ष यान की सफल कार्यप्रणाली के कारण यह लगभग साढ़े सात वर्षों तक सक्रिय रहा। अप्रैल 2022 में ISRO का इससे संपर्क टूट गया।
मंगलयान की सफलता ने भारत की अंतरिक्ष तकनीक, वैज्ञानिक क्षमता और कम लागत में जटिल अंतरिक्ष मिशन पूरा करने की योग्यता को वैश्विक पहचान दिलाई। एक ऐसी परिस्थिति, जो शुरुआत में चंद्रयान-2 के लिए बाधा बनी थी, वही आगे चलकर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई।
अब भारत मंगल ग्रह के लिए अपने अगले अभियानों की दिशा में काम कर रहा है। मंगलयान की कहानी इस बात का उदाहरण है कि मुश्किल परिस्थितियों में उपलब्ध संसाधनों और वैज्ञानिक सोच का सही इस्तेमाल किस तरह एक बड़ी उपलब्धि में बदल सकता है।