स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव में कुछ वर्ष पहले ही टाइल्स बिछाकर सड़क का निर्माण किया गया था। उस समय इसे “चका-चक” सड़क बताकर विकास का उदाहरण पेश किया गया। लेकिन महज दो-तीन साल के भीतर ही उस सड़क को उखाड़ दिया गया और अब प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत दोबारा निर्माण किया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पहले से सड़क मौजूद थी, तो उसे हटाकर फिर से निर्माण करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इस प्रक्रिया को लेकर ग्रामीणों और स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है। उनका आरोप है कि यह सब केवल नए बजट को खपाने और कमीशनखोरी के लिए किया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का “डबल निर्माण” तकनीकी योजना और निगरानी की गंभीर विफलता को दर्शाता है। यदि किसी सड़क का जीवनकाल अभी बाकी था, तो उसे तोड़कर नई योजना के तहत बनाना न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि संसाधनों की बर्बादी भी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के मामलों को लेकर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि पहले एक योजना के तहत कार्य किया जाता है और फिर उसे अधूरा या अनुपयुक्त बताकर दूसरी योजना से दोबारा निर्माण कर दिया जाता है। इससे न केवल सरकारी खजाने पर भार पड़ता है, बल्कि विकास की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
इस मामले में स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि पर्याप्त साक्ष्य होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इससे यह धारणा बन रही है कि जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच मिलीभगत हो सकती है।
जनता अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है। उनका कहना है कि जिन पंचायतों में पिछले कुछ वर्षों में इस प्रकार के दोहरे निर्माण कार्य हुए हैं, उनकी तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही, दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
यह मामला केवल साल्ही गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को उजागर करता है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो विकास कार्यों पर लोगों का विश्वास कमजोर होता जाएगा।
अंततः यह जरूरी है कि शासन और प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लें और सुनिश्चित करें कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जनता तक पहुंचे, न कि केवल कागजों और ठेकेदारी व्यवस्था तक सीमित रह जाए।