महासमुंद में मूक-बधिर बच्चों के लिए शासकीय स्तर पर स्पीच थेरेपी शुरू करने की मांग, विनोद चन्द्राकर ने कलेक्टर को लिखा पत्र

महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद चन्द्राकर ने जिले के मूक-बधिर बच्चों के हित में शासकीय स्तर पर स्पीच थेरेपी की सुविधा शुरू करने की मांग की है। उन्होंने कलेक्टर को पत्र लिखकर समाज कल्याण विभाग के बहुविकलांग भवन या डीएमएफ के माध्यम से यह सेवा प्रारंभ करने का आग्रह किया, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को नि:शुल्क और सुलभ उपचार मिल सके।

Jul 29, 2026 - 17:14
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महासमुंद में मूक-बधिर बच्चों के लिए शासकीय स्तर पर स्पीच थेरेपी शुरू करने की मांग, विनोद चन्द्राकर ने कलेक्टर को लिखा पत्र

UNITED NEWS OF ASIA. शिखा दास, महासमुंद l जिले के मूक-बधिर बच्चों के बेहतर भविष्य और उनके समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए महासमुंद के पूर्व संसदीय सचिव एवं पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चन्द्राकर ने कलेक्टर को पत्र लिखकर शासकीय स्तर पर स्पीच थेरेपी की सुविधा प्रारंभ करने की मांग की है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि जिले में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं, जो जन्मजात या अन्य कारणों से बोलने और सुनने में असमर्थ हैं। इनमें पंजीकृत और अपंजीकृत दोनों श्रेणी के बच्चे शामिल हैं, जिनमें अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। ऐसे बच्चों को समय पर स्पीच थेरेपी उपलब्ध नहीं होने के कारण उनका शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है।

पत्र में विनोद चन्द्राकर ने उल्लेख किया कि मूक-बधिर बच्चों के लिए स्पीच थेरेपी केवल उपचार नहीं, बल्कि उनके जीवन को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस थेरेपी की सहायता से बच्चों की संवाद क्षमता विकसित होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और वे शिक्षा तथा सामाजिक गतिविधियों में बेहतर तरीके से भागीदारी कर पाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते ऐसे बच्चों को उचित उपचार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो वे भविष्य में आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में महासमुंद जिले में शासकीय स्तर पर स्पीच थेरेपी की कोई नियमित सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके कारण गरीब परिवारों को निजी संस्थानों का सहारा लेना पड़ता है, जहां उपचार का खर्च काफी अधिक है। उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि जिले में एक निजी संस्था बिना पंजीयन के स्पीच थेरेपी का संचालन कर रही है और इसके लिए प्रतिदिन लगभग ₹500 शुल्क लिया जाता है। चूंकि यह थेरेपी कई महीनों तक लगातार चलती है, इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवार इतने अधिक खर्च का वहन नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप अनेक बच्चे बीच में ही उपचार छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं या उन्हें आवश्यक चिकित्सा और प्रशिक्षण नहीं मिल पाता।

विनोद चन्द्राकर ने सुझाव दिया कि समाज कल्याण विभाग द्वारा ग्राम खैरा स्थित बहुविकलांग भवन में पहले से ही दिव्यांग बच्चों के लिए विभिन्न योजनाओं और सेवाओं का संचालन किया जा रहा है। यदि इसी भवन में स्पीच थेरेपी की सुविधा भी प्रारंभ कर दी जाए तो अतिरिक्त भवन या बुनियादी ढांचे की आवश्यकता नहीं होगी। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और जिले के जरूरतमंद बच्चों को उनके घर के अपेक्षाकृत निकट उपचार की सुविधा मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था दिव्यांग बच्चों और उनके परिजनों के लिए भी अधिक सुविधाजनक होगी।

पूर्व विधायक ने अपने पत्र में यह भी सुझाव दिया कि इस महत्वपूर्ण सेवा के संचालन के लिए समाज कल्याण विभाग की निराश्रित निधि अथवा मंडी शुल्क से प्राप्त राशि का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने उल्लेख किया कि पूर्व में भी बहुविकलांग भवन के निर्माण और संचालन में इसी प्रकार की निधियों का उपयोग किया गया था। इसलिए स्पीच थेरेपी जैसी अत्यंत आवश्यक सुविधा प्रारंभ करने के लिए भी इन संसाधनों का उपयोग किया जाना व्यवहारिक और जनहित में होगा।

इसके अलावा उन्होंने जिला प्रशासन से आग्रह किया कि यदि आवश्यक हो तो जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफ) के माध्यम से भी इस सेवा के लिए वित्तीय व्यवस्था की जा सकती है। उनका कहना है कि डीएमएफ का उद्देश्य स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना है। ऐसे में दिव्यांग बच्चों के उपचार और पुनर्वास जैसी महत्वपूर्ण सेवा को इस निधि से समर्थन मिलना चाहिए।

विनोद चन्द्राकर ने अपने पत्र में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस पहल नहीं की गई तो जिले के सैकड़ों मूक-बधिर बच्चों का भविष्य प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि बचपन में मिलने वाली स्पीच थेरेपी का प्रभाव सबसे अधिक होता है। यदि यह अवसर बच्चों को समय पर नहीं मिला तो आगे चलकर उनकी संवाद क्षमता, शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए इस विषय को केवल स्वास्थ्य सेवा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कलेक्टर से आग्रह किया कि समाज कल्याण विभाग, स्वास्थ्य विभाग और संबंधित अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित कर जिले में जल्द से जल्द शासकीय स्तर पर स्पीच थेरेपी केंद्र शुरू किया जाए। साथ ही प्रशिक्षित स्पीच थेरेपिस्ट की नियुक्ति, आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता और नियमित उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि दिव्यांग बच्चों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं मिल सकें।

पूर्व विधायक ने विश्वास जताया कि यदि प्रशासन इस दिशा में सकारात्मक पहल करता है तो महासमुंद जिले के सैकड़ों मूक-बधिर बच्चों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। इससे न केवल बच्चों की संवाद क्षमता और आत्मविश्वास में वृद्धि होगी, बल्कि वे शिक्षा, सामाजिक जीवन और भविष्य के रोजगार के अवसरों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि दिव्यांग बच्चों को समान अवसर उपलब्ध कराना समाज और प्रशासन दोनों की साझा जिम्मेदारी है। ऐसे प्रयास समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होंगे और जिले के जरूरतमंद बच्चों को सम्मानजनक एवं आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर प्रदान करेंगे।