प्रधानमंत्री मोदी ने मौजूदा वैश्विक शासन व्यवस्था की संरचना पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में निर्णय लेने की ताकत और वैश्विक संस्थानों में प्रभाव कुछ देशों तक अधिक केंद्रित है। उन्होंने इस स्थिति को ‘Pyramid of Privilege’ की संज्ञा देते हुए कहा कि ग्लोबल साउथ के देश कई वैश्विक संकटों की अग्रिम पंक्ति में रहते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण निर्णयों की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम रहती है।
पीएम मोदी ने इस व्यवस्था को ‘Platform of Partnership’ में बदलने की आवश्यकता बताई। उनका कहना था कि वैश्विक संस्थानों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें सभी देशों की आवाज और उनकी भागीदारी को उचित स्थान मिले। उन्होंने वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक प्रतिनिधित्व वाली और समावेशी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार भी प्रधानमंत्री के संबोधन का प्रमुख मुद्दा रहा। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक टाला नहीं जा सकता। इसके लिए स्पष्ट समयसीमा और ठोस परिणाम निर्धारित किए जाने चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने IMF और अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों में वोटिंग पावर, नेतृत्व और नीतिगत प्राथमिकताओं को वर्तमान वैश्विक आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की आवश्यकता बताई।
प्रधानमंत्री ने BRICS के माध्यम से ग्लोबल साउथ के युवा राजनयिकों और नीति निर्माताओं को मजबूत करने का प्रस्ताव भी रखा। इसके तहत युवाओं को Negotiation Skills, Practical Training और Legal Expertise उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। उनका मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर नीतियां बनाने और बातचीत की प्रक्रिया में युवा नीति विशेषज्ञों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
समुद्री व्यापार और उससे जुड़े कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर भी भारत की ओर से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने रखा गया। पीएम मोदी ने BRICS देशों के बीच ‘Seafarer Emergency Support Network’ बनाने की बात कही। प्रस्तावित नेटवर्क के माध्यम से आपात स्थिति में समुद्री कर्मचारियों को मेडिकल सहायता, जरूरी अलर्ट, उनके परिवारों तक सूचना पहुंचाने और सुरक्षित निकासी जैसी सुविधाओं में सहयोग किया जा सकेगा।
BRICS की भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि यह समूह किसी देश के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि BRICS का उद्देश्य सहयोग और साझेदारी को बढ़ावा देना है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘Continuity and Implementation Mechanism’ बनाने का प्रस्ताव रखा, ताकि BRICS की अध्यक्षता बदलने के बावजूद समूह की पहलों और लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन में निरंतरता बनी रहे।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में साझा भविष्य की अवधारणा पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य सभी का साझा है, तो उसके निर्माण का अधिकार और जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए। BRICS के मंच से रखे गए इन प्रस्तावों के जरिए भारत ने वैश्विक शासन व्यवस्था में अधिक प्रतिनिधित्व, साझेदारी और व्यावहारिक सहयोग की दिशा में अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं।