जब कंधे पर विराजे "नन्हे महादेव", भोरमदेव पदयात्रा में आस्था का अनूठा दृश्य बना आकर्षण
कवर्धा में सावन के पहले सोमवार को निकली भोरमदेव पदयात्रा के दौरान भगवान शिव के स्वरूप में सजे एक नन्हे बालक को श्रद्धालु ने अपने कंधों पर बैठाकर पूरी 18 किलोमीटर की यात्रा की। यह भावुक और आकर्षक दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विशेष केंद्र बन गया।
UNITED NEWS OF ASIA. सावन माह के पहले सोमवार को कवर्धा के बूढ़ा महादेव मंदिर से बाबा भोरमदेव मंदिर तक निकली 18 किलोमीटर लंबी पदयात्रा के दौरान आस्था, भक्ति और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बीच एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। एक शिवभक्त अपने कंधों पर भगवान शिव के स्वरूप में सजे एक नन्हे बालक को बैठाकर पूरे श्रद्धाभाव के साथ पदयात्रा करता नजर आया।
भगवान शिव के बाल स्वरूप में सजे इस बच्चे का आकर्षक रूप हर किसी के लिए कौतूहल का विषय बन गया। उसके पूरे शरीर पर भगवान शिव की तरह नीला रंग किया गया था। गले में नाग, हाथ में डमरू, माथे पर त्रिपुंड और सिर पर जटाओं की आकर्षक सजावट उसे साक्षात बाल महादेव का स्वरूप प्रदान कर रही थी। श्रद्धालु जहां-जहां से गुजर रहे थे, वहां मौजूद लोग इस अनूठे दृश्य को देखकर भावविभोर हो गए और कई लोगों ने अपने मोबाइल कैमरों में इस पल को कैद किया।
पदयात्रा के दौरान "हर-हर महादेव" और "बोल बम" के जयघोष से पूरा वातावरण शिवमय बना रहा। श्रद्धालु भक्ति गीतों और भजनों के साथ बाबा भोरमदेव के दर्शन के लिए आगे बढ़ते रहे। इस बीच कंधे पर विराजे "नन्हे महादेव" का दृश्य यात्रा की सबसे विशेष झलक बन गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि भोरमदेव पदयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का जीवंत उत्सव है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होकर भगवान भोलेनाथ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। कई श्रद्धालु अलग-अलग स्वरूपों में शामिल होकर धार्मिक संदेश देने का प्रयास भी करते हैं।
इस वर्ष भी पदयात्रा में महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। मार्गभर विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, फल, शरबत, चाय और भोजन की व्यवस्था की गई। प्रशासन ने भी सुरक्षा, स्वास्थ्य और यातायात की व्यापक व्यवस्था सुनिश्चित की, जिससे यात्रा शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुई।
नन्हे बालक का शिव स्वरूप इस पदयात्रा की सबसे यादगार तस्वीरों में शामिल हो गया। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे दृश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा से जोड़ने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि भोरमदेव पदयात्रा हर वर्ष केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का भव्य उत्सव बनकर सामने आती है।