कोरिया में मुआवजे की मार: 15 हजार नुकसान पर मिले सिर्फ 4 हजार, 3 साल से भटक रहा किसान
कोरिया जिले के एक किसान को प्राकृतिक आपदा में हुए नुकसान के बाद पूरी मुआवजा राशि नहीं मिली, वह तीन साल से शेष राशि के लिए प्रशासन के चक्कर काट रहा है।
UNITED NEWS OF ASIA. प्रदीप पाटकर, कोरिया। बैकुंठपुर (कोरिया) जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो प्रशासनिक व्यवस्था और मुआवजा प्रणाली पर सवाल खड़े करता है। ग्राम छुरी के किसान झन्नू लाल यादव पिछले तीन वर्षों से अपने नुकसान की पूरी भरपाई के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें न्याय नहीं मिल पाया है।
यह मामला 14 जून 2023 का है, जब छुरी गांव में तेज आंधी-तूफान के कारण झन्नू लाल यादव के खपरैल मकान पर एक बड़ा नीम का पेड़ गिर गया। इस हादसे में मकान की दीवार पूरी तरह ढह गई और 500 से अधिक खपरैल टूट गए, जिससे परिवार बेघर हो गया।
घटना के बाद राजस्व विभाग की टीम ने मौके का निरीक्षण किया और पटवारी द्वारा तैयार प्रतिवेदन में लगभग 15,000 रुपये के नुकसान का आकलन किया गया। यह आकलन RBC 6-4 के तहत किया गया था, जिसके आधार पर पीड़ित को मुआवजा मिलने की उम्मीद थी।
लेकिन जब सहायता राशि स्वीकृत हुई, तो यह उम्मीद टूट गई। तहसील पोड़ी (बचरा) कार्यालय द्वारा जारी आदेश में केवल 4,000 रुपये की सहायता राशि दी गई। पीड़ित के अनुसार यह राशि ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ साबित हुई, क्योंकि इससे न तो मलबा हट सका और न ही मकान की मरम्मत हो पाई।
झन्नू लाल यादव ने शेष 11,000 रुपये की राशि के लिए लगातार प्रयास किए। दिसंबर 2024 में उन्होंने कलेक्टर कार्यालय में जनदर्शन के माध्यम से आवेदन दिया। इसके बाद पूरे वर्ष 2025 में तहसील और जिला मुख्यालय के कई चक्कर लगाए, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला।
9 अप्रैल 2026 को उन्होंने एक बार फिर अपनी समस्या मीडिया के सामने रखी और प्रशासन से अंतिम बार न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने अपने आवेदन के साथ आधार कार्ड, बैंक पासबुक, पटवारी रिपोर्ट और भुगतान की पर्ची जैसे सभी दस्तावेज भी प्रस्तुत किए हैं।
पीड़ित झन्नू लाल यादव का कहना है, “जब पटवारी ने खुद 15 हजार के नुकसान का आकलन किया, तो मुझे केवल 4 हजार ही क्यों दिए गए? तीन साल से मैं सिर्फ आवेदन दे रहा हूं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।”
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की परेशानी को दर्शाता है, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या तकनीकी प्रक्रियाएं इतनी जटिल हैं कि एक गरीब किसान को अपने अधिकार के लिए वर्षों तक भटकना पड़े?
स्थानीय लोगों का भी कहना है कि प्रशासन को इस मामले में जल्द हस्तक्षेप कर पीड़ित को उसका पूरा हक दिलाना चाहिए।
कुल मिलाकर, यह घटना सरकारी मुआवजा प्रणाली की खामियों को उजागर करती है और यह सवाल उठाती है कि क्या वास्तव में जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ समय पर और सही तरीके से पहुंच पा रहा है या नहीं।