खैरागढ़ में 200 परिवारों का सामाजिक बहिष्कार: कलार समाज में गुटबाजी, अवैध वसूली और प्रताड़ना के आरोप

खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले में कलार समाज के लगभग 200 परिवारों के सामाजिक बहिष्कार और अवैध वसूली का गंभीर मामला सामने आया है। पीड़ितों ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से न्याय की गुहार लगाई है।

Apr 21, 2026 - 16:28
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खैरागढ़ में 200 परिवारों का सामाजिक बहिष्कार: कलार समाज में गुटबाजी, अवैध वसूली और प्रताड़ना के आरोप

UNITED NEWS OF ASIA. मनोहर सेन, खैरागढ़ l खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के वनांचल क्षेत्रों से सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने मानवाधिकारों और संवैधानिक अधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां कलार समाज के करीब 200 परिवारों को कथित रूप से समाज से बाहर कर दिया गया है और उनके साथ अवैध वसूली व मानसिक प्रताड़ना की जा रही है।

मामला उस समय सामने आया जब ‘छत्तीसगढ़ प्रांत कलार सिन्हा समाज’ से जुड़े पीड़ित परिवारों ने जिला अध्यक्ष दीनदयाल सिन्हा के नेतृत्व में कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पीड़ितों का आरोप है कि ‘चंदनहा कलार समाज’ के पदाधिकारी उन्हें मुख्यधारा में शामिल होने की सजा दे रहे हैं।

शिकायत के अनुसार, साल 2023 में साल्हेवारा और आसपास के क्षेत्रों के करीब 200 परिवारों ने शिक्षा और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से ‘छत्तीसगढ़ डडसेना कलार समाज’ में विलय किया था। इस निर्णय के बाद कथित रूप से पुराने समाज के पदाधिकारियों ने इन परिवारों का सामाजिक बहिष्कार शुरू कर दिया।

पीड़ित पूनाराम सिन्हा की कहानी इस पूरे मामले की गंभीरता को दर्शाती है। उन्होंने बताया कि जनवरी 2026 में उनके ससुर के निधन पर उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोक दिया गया। बाद में अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए उनसे 3000 रुपये का जुर्माना वसूला गया और उन्हें दशगात्र कार्यक्रम से भी दूर रखा गया।

इसी तरह अन्य पीड़ितों—भुनेश्वर सिन्हा, दुवासू सिन्हा और टूम्मन सिन्हा—ने भी बताया कि उनसे हजारों रुपये की अवैध मांग की जा रही है। कुछ मामलों में ससुराल जाने या सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने पर भी जुर्माना लगाया गया है।

पीड़ितों का आरोप है कि उन्हें जबरन मुंडन कराने, माफी मांगने और सामूहिक भोज देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। यह स्थिति न केवल सामाजिक उत्पीड़न का उदाहरण है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध), 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) और 19 (स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन भी मानी जा रही है।

पीड़ितों ने बताया कि उन्होंने पहले भी छुईखदान थाने में शिकायत की थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब उन्होंने जिला प्रशासन और पुलिस से सख्त कार्रवाई की मांग की है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज भी समाज के कुछ हिस्सों में लोगों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। अब सभी की नजर प्रशासन पर है कि वह इस मामले में क्या कदम उठाता है और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने में कितनी तेजी दिखाता है।