गरियाबंद में सिस्टम की नाकामी, ग्रामीण और स्कूली बच्चे मिलकर कच्चे मकान को बना रहे स्कूल भवन
गरियाबंद के मैनपुर ब्लॉक स्थित मोतीपानी गांव में मुख्यमंत्री जतन योजना के तहत मंजूर अतिरिक्त कक्ष का काम ठेकेदार द्वारा अधूरा छोड़े जाने पर ग्रामीणों और स्कूली बच्चों ने मिलकर पुराने कच्चे मकान की मरम्मत कर उसे पढ़ाई योग्य बनाया है.
UNITED NEWS OF ASIA. गरियाबंद l छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से प्रशासनिक व्यवस्था की बड़ी लापरवाही और उदासीनता उजागर हुई है। मैनपुर विकासखंड के मोतीपानी गांव में सरकार की योजनाओं और दावों की धज्जियां उड़ती दिखाई दे रही हैं। यहां प्राथमिक शाला भवन की जर्जर स्थिति और अधर में लटके निर्माण कार्य के कारण ग्रामीणों तथा मासूम स्कूली बच्चों को खुद ही मोर्चा संभालना पड़ा है। गांव के लोग और पढ़ाई करने वाले छोटे-छोटे बच्चे मिलकर एक पुराने कच्चे मकान को स्कूल भवन के रूप में तैयार करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कवेलू बदलने से लेकर मिट्टी की दीवारों की मरम्मत तक का सारा काम ग्रामीण खुद श्रमदान करके पूरा कर रहे हैं।
पूरा मामला चार साल पहले का है, जब मोतीपानी प्राथमिक शाला के लिए मुख्यमंत्री जतन योजना के तहत अतिरिक्त कक्ष निर्माण की स्वीकृति दी गई थी। इस निर्माण कार्य के लिए आठ लाख रुपये की राशि स्वीकृत हुई थी। वर्तमान में इस स्कूल में सैंतालीस बच्चे दर्ज हैं और उनके बैठने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। इस अतिरिक्त कक्ष के निर्माण और देखरेख का जिम्मा ट्राइबल डिपार्टमेंट को दिया गया था। विभागीय निगरानी के बावजूद ठेकेदार ने बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया। आरोप है कि ठेकेदार ने स्वीकृत बजट की आधी राशि खर्च की और काम को आधा-अधूरा छोड़कर वहां से गायब हो गया।
अधूरे पड़े निर्माण कार्य और जर्जर पुराने भवन के कारण बरसात और सामान्य दिनों में भी बच्चों के सिर पर हादसों का खतरा बना रहता था। इस खतरे को भांपते हुए गांव के लोगों ने तय किया कि प्रशासन के भरोसे बैठने से बच्चों का भविष्य और जीवन दोनों जोखिम में पड़ जाएगा। इसके बाद ग्रामीणों ने एकजुट होकर पुराने कच्चे मकान की मरम्मत करने का फैसला लिया। इस कार्य में स्कूल के छोटे बच्चों ने भी अपने स्तर पर सहयोग दिया, जो प्रशासनिक तंत्र की लाचारी को साफ बयां करता है।
मैनपुर ब्लॉक में यह कोई अकेला मामला नहीं है। क्षेत्र के करीब चालीस से ज्यादा स्कूल भवनों के निर्माण कार्य सालों से अधूरे पड़े हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने लापरवाह ठेकेदारों पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय केवल नाममात्र की औपचारिकता पूरी करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। न तो अधिकारियों ने मौके पर जाकर जमीनी हकीकत देखना मुनासिब समझा और न ही ठेकेदारों से काम पूरा कराया। इस वजह से आदिवासी अंचल के बच्चों को बुनियादी शिक्षा सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
प्रशासन की इस बेरुखी के बीच ग्रामीणों का यह सामूहिक प्रयास एक ओर जहां मिसाल बना है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आठ लाख रुपये स्वीकृत होने के बावजूद बच्चों का मिट्टी के कच्चे मकान में बैठकर पढ़ना व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है। ग्रामीणों की मांग है कि दोषी ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई की जाए और अधूरे पड़े स्कूल भवनों का निर्माण कार्य जल्द से जल्द पूरा कराया जाए।