FRK टेंडर विवाद: कीमत 39 से 60 रुपये तक, शर्तों में बदलाव से स्थानीय उद्योगों पर मंडराया संकट
छत्तीसगढ़ में फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) की खरीदी के लिए जारी नए टेंडर में अचानक शर्तें बदलने से स्थानीय उद्योगों पर संकट खड़ा हो गया है। कीमत 39 से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की आशंका है, जिससे सरकारी खजाने पर 200 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
UNITED NEWS OF ASIA.अमृतेश्वर सिंह, रायपुर। छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अंतर्गत वितरित किए जाने वाले फोर्टिफाइड चावल के लिए आवश्यक फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) की खरीदी को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। राज्य विपणन संघ (मार्कफेड) द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए जारी किए गए नए टेंडर में अचानक और एकतरफा शर्तों में बदलाव किए जाने से प्रदेश के स्थानीय FRK उद्योगों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।
जानकारी के अनुसार, मार्कफेड इस वर्ष लगभग 84 हजार मीट्रिक टन FRK की खरीदी करने जा रहा है। पूर्व में यह खरीदी लगभग 39 रुपये प्रति किलो की दर से होती रही है, लेकिन नए टेंडर की शर्तों के चलते इसकी कीमत 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है, तो इससे राज्य सरकार के खजाने पर 175 से 200 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
स्थानीय उद्योग संगठनों का आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस तरह बदली गई हैं कि प्रदेश के करीब 80 प्रतिशत छोटे और मध्यम FRK उत्पादक अयोग्य हो गए हैं। इसके विपरीत, केवल 20 प्रतिशत बड़े और बाहरी राज्यों के मिलर्स ही इस प्रक्रिया में शामिल हो पाए हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि यह कदम न केवल छत्तीसगढ़ भंडार क्रय अधिनियम की भावना के विपरीत है, बल्कि स्थानीय उद्यमिता को समाप्त करने की साजिश भी प्रतीत होती है।
राइस मिलरों ने यह भी आपत्ति जताई है कि इतने बड़े बदलाव के लिए नियमानुसार कम से कम 15 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए था, जो नहीं दिया गया। इससे स्थानीय मिलर्स को तैयारी का अवसर ही नहीं मिल पाया।
टेंडर प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या केवल 20 प्रतिशत चयनित मिलर्स पूरे प्रदेश की FRK आपूर्ति समय पर कर पाएंगे? यदि आपूर्ति बाधित होती है, तो PDS व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, नई भुगतान शर्तों के अनुसार मिलर्स को FRK की राशि तुरंत चुकानी होगी, जबकि सरकार से भुगतान 1 से 2 साल बाद मिलने की व्यवस्था है, जो छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए आर्थिक रूप से घातक साबित हो सकती है।
यह पूरा मामला अब केवल एक टेंडर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रदेश की औद्योगिक नीति, स्थानीय रोजगार और सरकारी वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। उद्योग जगत ने सरकार से मांग की है कि टेंडर की शर्तों की पुनः समीक्षा कर स्थानीय उद्योगों को संरक्षण दिया जाए।