सुर, संगम और समर्पण से सजी रजत महोत्सव की संध्या — भूमि त्रिवेदी, ऊषा बारले और राकेश शर्मा की प्रस्तुति ने मोहा मन
छत्तीसगढ़ रजत महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या में सोमवार को संगीत, नृत्य और लोकसंस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिला। भूमि त्रिवेदी के जोशीले गीत, ऊषा बारले की पंडवानी और राकेश शर्मा की सूफियाना प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर। छत्तीसगढ़ रजत महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या सोमवार की रात संगीत, नृत्य और लोकसंस्कृति के रंगों से सराबोर रही। राज्योत्सव मैदान में हजारों दर्शकों की मौजूदगी में यह शाम ‘सुर, संगम और समर्पण’ का अनूठा उत्सव बन गई। बॉलीवुड की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका भूमि त्रिवेदी, छत्तीसगढ़ की पद्मश्री ऊषा बारले, और सूफी गायक राकेश शर्मा की प्रस्तुतियों ने इस सांस्कृतिक संध्या को अविस्मरणीय बना दिया।
भूमि त्रिवेदी ने अपने ऊर्जावान और भावपूर्ण गायन से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने “ससुराल गेंदा फूल”, “सैय्यारा”, “राम चाहे लीला”, “झुमका गिरा रे”, “जय जय शिवशंकर”, “होली खेले रघुवीरा”, “रंग बरसे”, “ये देश है वीर जवानों का”, “डम-डम ढोल बाजे” और “उड़ी-उड़ी जाए” जैसे गीतों को अपने नए अंदाज़ में प्रस्तुत कर मैदान में उत्साह का समंदर भर दिया। हिंदी, पंजाबी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के मिश्रण ने संगीतप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
पंडवानी की वीरता और सूफी संगीत की रूहानी छुअन
इसके बाद मंच संभाला छत्तीसगढ़ की गौरवशाली कलाकार, पद्मश्री ऊषा बारले ने। उन्होंने पंडवानी शैली में महाभारत की गाथा सुनाते हुए “चीरहरण” प्रसंग को ऐसी भावनात्मक गहराई से प्रस्तुत किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए। उनकी गायकी, तानपुरे की ध्वनि और मुखाभिनय ने दर्शकों के मन में लोककला की शक्ति का गहरा प्रभाव छोड़ा।
सांस्कृतिक संध्या का अगला चरण सूफी संगीत की रूहानी महक से भरा हुआ था। सूफी पार्श्वगायक राकेश शर्मा और उनकी टीम ने “दमादम मस्त कलंदर”, “मौला मेरे मौला” और “चोला माटी के राम” जैसे गीतों से दर्शकों को भक्ति और प्रेम के सुरों में डुबो दिया। उनकी साथी गायिका निशा शर्मा और कलाकारों ने भी लय और ताल के साथ इस माहौल को और भी ऊंचाई दी।
माटी की खुशबू और लोकनृत्य की छटा
राज्योत्सव की इस शाम में छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की झलक भी देखने को मिली। प्रादेशिक लोकमंच के कलाकार कुलेश्वर ताम्रकार ने ‘नाचा’ शैली में छत्तीसगढ़ की माटी की महक और लोकजीवन की जीवंतता को मंच पर साकार किया। उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी परंपरा, ऊर्जा और सरलता की याद दिलाई।
इस सांस्कृतिक संध्या ने साबित किया कि छत्तीसगढ़ केवल परंपरा का संरक्षक ही नहीं, बल्कि आधुनिकता और लोकजीवन के बीच सेतु भी है। संगीत, नृत्य और लोककला के इस संगम ने राज्योत्सव मैदान को एकता, आनंद और गौरव की अनुभूति से भर दिया।