10वीं-12वीं के विद्यार्थियों के भविष्य से कथित खिलवाड़, फर्जी लेटरहेड, फर्जी नियुक्ति एवं शासन-प्रशासन को गुमराह करने के गंभीर आरोप

छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ एजुकेशन (CDBE) ने मिशन स्कूल से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेज, फर्जी नियुक्ति, निलंबित प्राचार्य के हस्ताक्षर और जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री से उच्च स्तरीय जांच, फोरेंसिक परीक्षण और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

Jul 25, 2026 - 17:15
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10वीं-12वीं के विद्यार्थियों के भविष्य से कथित खिलवाड़, फर्जी लेटरहेड, फर्जी नियुक्ति एवं शासन-प्रशासन को गुमराह करने के गंभीर आरोप

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ एजुकेशन (CDBE) ने मिशन स्कूल से जुड़े एक गंभीर मामले में मुख्यमंत्री को विस्तृत शिकायत सौंपते हुए पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। संस्था का आरोप है कि कथित फर्जी लेटरहेड, फर्जी हस्ताक्षर, फर्जी नियुक्ति पत्र और शासन-प्रशासन को गुमराह करने जैसी गतिविधियों के कारण कक्षा 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों का भविष्य संकट में पड़ सकता है।

CDBE के अनुसार यह मामला केवल एक विद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य, संवैधानिक प्रावधानों और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। संस्था का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो इसका प्रभाव विद्यार्थियों की अंकसूची, प्रमाण-पत्र, उच्च शिक्षा में प्रवेश और भविष्य की संभावनाओं पर पड़ सकता है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि निलंबित प्राचार्य भावना आर्थर द्वारा कथित रूप से कक्षा 10वीं एवं 12वीं के विद्यार्थियों की अंकसूची और अन्य शैक्षणिक अभिलेखों पर हस्ताक्षर किए गए, जबकि उनके विरुद्ध निलंबन आदेश प्रभावी था। संस्था ने कहा है कि इस तथ्य की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, ताकि विद्यार्थियों के दस्तावेजों की वैधता सुनिश्चित की जा सके।

CDBE ने यह भी आरोप लगाया है कि अतुल आर्थर, शशि वाघे तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों द्वारा कथित रूप से फर्जी लेटरहेड, फर्जी हस्ताक्षर, फर्जी नियुक्ति पत्र और अन्य दस्तावेज तैयार कर शासन, प्रशासन, पुलिस तथा अन्य सरकारी अधिकारियों को गुमराह करने का प्रयास किया गया। संस्था का कहना है कि इन दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

संस्था ने अपने ज्ञापन में कहा है कि वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद-30 के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्था है, जिसके प्रबंधन का अधिकार केवल वैधानिक प्रबंधन समिति को प्राप्त है। इसके बावजूद कथित रूप से वैधानिक आदेशों की अनदेखी करते हुए विद्यालय संचालन और नियुक्तियों से जुड़े निर्णय लिए गए।

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि वैधानिक प्रबंधन समिति के आदेशों की कथित अवहेलना करते हुए विद्यालय का ताला तोड़कर संचालन कराया गया। यदि जांच में यह आरोप सही साबित होता है तो इसे गंभीर और दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए।

CDBE ने दावा किया है कि इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही और जिला कलेक्टर को समय-समय पर कई लिखित शिकायतें दी गईं, लेकिन अब तक न तो निष्पक्ष जांच हुई और न ही प्रभावी कार्रवाई की गई। संस्था का आरोप है कि संबंधित अधिकारियों की कथित निष्क्रियता और लापरवाही के कारण आज अनेक विद्यार्थियों का भविष्य अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है।

ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि यह जांच की जाए कि जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने रजिस्ट्रार फर्म एवं सोसायटी अधिनियम की धारा-27 के तहत पंजीकृत वैधानिक पदाधिकारियों का सत्यापन किया था या नहीं। यदि सत्यापन नहीं किया गया तो किन आधारों पर अन्य व्यक्तियों को विद्यालय संचालन और नियुक्ति संबंधी अधिकार दिए गए।

CDBE ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका की विभागीय जांच हो, कथित फर्जी दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराई जाए, 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों की अंकसूची एवं शैक्षणिक अभिलेखों का सत्यापन कराया जाए तथा दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों और अधिकारियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

संस्था का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो इससे न केवल सैकड़ों विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित होगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, शासन-प्रशासन की पारदर्शिता और संविधान द्वारा संरक्षित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। CDBE ने जांच पूरी होने तक विद्यालय का संचालन केवल वैधानिक एवं अधिकृत प्रबंधन समिति के माध्यम से सुनिश्चित करने की भी मांग की है।