गोंडी भाषा को डिजिटल मंच पर नई पहचान दे रहे हैं भीमराज शोरी – माकड़ी के युवा की प्रेरणादायक पहल
कांकेर जिले के माकड़ी विकासखंड के युवा भीमराज शोरी गोंडी भाषा को डिजिटल मंचों पर जीवित रखने की अनोखी मुहिम चला रहे हैं। यूट्यूब और इंस्टाग्राम के माध्यम से वे गोंडी भाषा में कॉमेडी, जागरूकता और सांस्कृतिक वीडियो बनाकर विलुप्त होती इस भाषा को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं।
UNITED NEWS OF ASIA. राज्नेद्र मंडावी, कांकेर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल माकड़ी विकासखंड के लुभा नया पारा गांव के युवा भीमराज शोरी आज गोंडी भाषा को नई पहचान दिलाने के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं। 15 अप्रैल 1997 को किसान परिवार में जन्मे भीमराज ने अपने जुनून और लगन से सोशल मीडिया पर गोंडी भाषा के संरक्षण की एक नई मुहिम शुरू की है।
वर्ष 2022 में उन्होंने “Bhimagondivlogs” नाम से यूट्यूब चैनल बनाया। प्रारंभिक दौर में तकनीकी अनुभव कम होने के बावजूद उन्होंने गोंडी भाषा में मनोरंजक और शिक्षाप्रद वीडियो बनाना शुरू किया। बाद में उन्होंने इंस्टाग्राम पर “bhimshori_07” नाम से अकाउंट बनाकर गोंडी भाषा में कॉमेडी, सामाजिक संदेश और पलायन जैसे मुद्दों पर वीडियो पोस्ट किए। धीरे-धीरे उन्हें व्यापक सराहना मिली और वर्तमान में उनके 4,357 से अधिक फॉलोअर्स हैं।
उनके वीडियो गोंडी समाज में भाषा के प्रति जागरूकता पैदा कर रहे हैं। हाल ही में 14 मार्च 2025 को उन्होंने “जंगल को आग से बचाने” पर गोंडी भाषा में वीडियो जारी किया, जिसे हजारों लोगों ने देखा और सराहा। आज उनके यूट्यूब चैनल पर करीब 2,000 सब्सक्राइबर हैं।
भीमराज का मानना है कि गोंडी भाषा तेजी से विलुप्त हो रही है और इसे बचाने के लिए जन-सहभागिता आवश्यक है। वे कहते हैं,
“गोंडी भाषा विलुप्त होने की कगार पर है। मैं इसे जीवित रखने के लिए लगातार गोंडी में वीडियो बनाऊंगा ताकि नई पीढ़ी इसे सीख सके।”
उनकी लोकप्रियता अब बस्तर, उड़ीसा और आसपास के गांवों तक फैल चुकी है। उनके परिवार – बड़े भाई सूरज शोरी, भाभी सोमारी शोरी, पिता दशरथ शोरी, और भतीजे कुणाल व हनियु – ने हमेशा उनका सहयोग किया।
उनकी टीम में गजानंद मरकाम, पिंकी शोरी, लखी लाल मरकाम, मनोज नेताम, रोहित नेताम, ललित मरकाम, प्रदीप शोरी, अज्जू मरकाम, सविता मरकाम, संजय मरकाम और पूजा नेताम सक्रिय हैं।
भीमराज शोरी का उद्देश्य है कि गोंडी भाषा घर-घर में फिर से बोली जाए और युवा अपनी मातृभाषा पर गर्व महसूस करें।
उनकी यह डिजिटल पहल न केवल भाषा संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि परंपरा और तकनीक मिलकर संस्कृति को जीवित रख सकते हैं।