कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिलाध्यक्ष ने उन नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण पद दे दिए हैं, जिन्हें पहले पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित किया गया था। इससे संगठन में कार्यरत समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच भारी नाराजगी देखी जा रही है।
क्या है पूरा मामला
नाराज कार्यकर्ताओं के अनुसार, पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह के करीबी माने जाने वाले अरुण अग्रवाल और संजीत चौबे पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी के खिलाफ काम करने के आरोप लगे थे। इस कारण उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया था।
हालांकि, हाल ही में जिलाध्यक्ष हरिहर यादव द्वारा अरुण अग्रवाल को जिला उपाध्यक्ष और संजीत चौबे को कार्यकारिणी सदस्य बनाए जाने से विवाद खड़ा हो गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह निर्णय पार्टी अनुशासन और सिद्धांतों के खिलाफ है।
कार्यकर्ताओं में गहरा आक्रोश
पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल नियुक्ति का मामला नहीं है, बल्कि उन लोगों का अपमान है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। उनका आरोप है कि जिलाध्यक्ष यह संदेश देना चाहते हैं कि जिले में केवल उन्हीं की चलती है।
इसके अलावा एक और मुद्दा सामने आया है कि एक ही परिवार के तीन सदस्यों को संगठन में महत्वपूर्ण पद दिए गए हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में असंतोष और बढ़ गया है।
कार्यकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ पदाधिकारियों का जिले में स्थायी निवास तक नहीं है, बावजूद इसके उन्हें जिम्मेदारी दी गई है, जिससे स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है।
दिल्ली कूच की चेतावनी
नाराज कार्यकर्ताओं ने अब आर-पार की लड़ाई का संकेत देते हुए चेतावनी दी है कि यदि विवादित नियुक्तियों को रद्द नहीं किया गया और जिलाध्यक्ष को पद से नहीं हटाया गया, तो वे दिल्ली जाकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से शिकायत करेंगे।
कार्यकर्ताओं ने बताया कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट से मिलकर पूरे मामले की जानकारी देंगे।
उन्होंने कहा कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता, तब तक वे दिल्ली में ही डटे रहेंगे।
संगठन पर पड़ सकता है असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इस विवाद का जल्द समाधान नहीं हुआ, तो इसका असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। संगठन के भीतर बढ़ती नाराजगी से पार्टी को भीतरघात और विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
फिलहाल, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व इस बढ़ते विवाद को शांत करने के लिए क्या कदम उठाता है और संगठन में एकता बनाए रखने के लिए क्या रणनीति अपनाई जाती है।