राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से मिली नई जिंदगी, डुंडेरा की जीविका का एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) के तहत राजनांदगांव जिले के डुंडेरा गांव की जन्मजात श्रवण बाधित बच्ची जीविका का एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया गया। अब नियमित स्पीच थेरेपी और पुनर्वास की मदद से वह आवाजों को सुनने और सामान्य बच्चों की तरह बोलना सीख सकेगी।

Aug 3, 2026 - 15:50
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राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से मिली नई जिंदगी, डुंडेरा की जीविका का एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) के माध्यम से राजनांदगांव जिले की एक बच्ची के जीवन में नई उम्मीद जगी है। डोंगरगढ़ विकासखंड के ग्राम डुंडेरा की जन्मजात श्रवण बाधित बच्ची जीविका का एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया गया है। इस सफल उपचार के बाद अब वह नियमित स्पीच थेरेपी और पुनर्वास की सहायता से धीरे-धीरे आवाजों की दुनिया से परिचित हो सकेगी और सामान्य बच्चों की तरह बोलना भी सीख पाएगी।

जीविका जन्म से ही सुनने में असमर्थ थी। इस कारण वह अन्य बच्चों की तरह बोल भी नहीं पा रही थी। परिवार लंबे समय से उसकी समस्या को लेकर चिंतित था। इसी दौरान ग्राम डुंडेरा के आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक-1 में नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की टीम ने उसकी समस्या की पहचान की।

डोंगरगढ़ की आरबीएसके टीम ने बिना देरी किए आवश्यक स्वास्थ्य जांच कराई और विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श लेने के बाद जीविका को एम्स रायपुर रेफर किया। वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में उसका सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया गया। यह ऑपरेशन उन बच्चों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है जो जन्मजात श्रवण बाधिता से पीड़ित होते हैं।

अब चिकित्सकों की सलाह के अनुसार जीविका की नियमित स्पीच थेरेपी और पुनर्वास प्रक्रिया जारी रहेगी। इससे वह धीरे-धीरे ध्वनियों को पहचानना सीखेगी और बोलने की क्षमता भी विकसित कर सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर उपचार मिलने से ऐसे बच्चों के सामान्य जीवन जीने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) का उद्देश्य बच्चों में जन्मजात विकार, पोषण संबंधी समस्याओं, विकास में देरी और अन्य गंभीर बीमारियों की समय रहते पहचान कर उनका निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराना है। आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्थानों में रेफर कर आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ भी दिलाया जाता है।

जीविका का मामला इस बात का उदाहरण है कि यदि बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच समय पर हो और उचित चिकित्सा उपलब्ध कराई जाए, तो उनके जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। आरबीएसके टीम की सतर्कता, समन्वय और त्वरित कार्रवाई के कारण एक बच्ची को सुनने और बोलने की नई उम्मीद मिली है।

यह पहल न केवल जीविका और उसके परिवार के लिए खुशियों का कारण बनी है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं दूरस्थ क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से पहुंचकर जरूरतमंद बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। समय पर पहचान, उचित इलाज और लगातार पुनर्वास के माध्यम से ऐसे अनेक बच्चों का भविष्य बेहतर बनाया जा सकता है।