उदय कोटक ने भारत को सुधारों में तेजी लाने की दी सलाह, ‘सोने की पहेली’ सुलझाने पर जोर
अनुभवी बैंकर उदय कोटक ने भारत की आर्थिक मजबूती बनाए रखने के लिए सुधारों में तेजी लाने और सोने के बढ़ते आयात से जुड़ी चुनौती का समाधान खोजने पर जोर दिया। उन्होंने वित्त वर्ष 2027 में भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट के करीब 60 अरब डॉलर रहने और सोने के आयात के 88 से 90 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान जताया। कोटक ने राजकोषीय अनुशासन, वित्तीयकरण के जोखिम और केंद्र-राज्यों के बीच बेहतर संतुलन की जरूरत भी बताई।
UNITED NEWS OF ASIA. अनुभवी बैंकर उदय कोटक ने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए तेज आर्थिक सुधारों की जरूरत बताई है। विकसित भारत FinMin-States कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए कोटक ने खास तौर पर सोने के आयात से जुड़ी चुनौती को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत को ‘सोने की पहेली’ का समाधान तलाशना होगा, क्योंकि ऊंची वैश्विक कीमतों के बीच सोने का बढ़ता आयात देश के बाहरी खाते पर दबाव डाल सकता है।
कोटक के मुताबिक वित्त वर्ष 2027 में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट करीब 60 अरब डॉलर रह सकता है, जबकि सोने का आयात 88 से 90 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि यदि सोने के आयात को अलग कर दिया जाए तो भारत करंट अकाउंट सरप्लस की स्थिति में भी हो सकता है। उनके अनुसार सोने के आयात की वजह से पैदा होने वाली चुनौती को समझना और उसके समाधान के लिए नीतिगत कदम उठाना जरूरी है।
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में तेजी के कारण भारत के लिए सोने के आयात का कुल मूल्य बढ़ सकता है। भले ही आयात की मात्रा उसी अनुपात में न बढ़े, लेकिन ऊंची कीमतें आयात बिल पर असर डाल सकती हैं। ऐसे में कोटक ने बाहरी क्षेत्र से जुड़े जोखिमों पर सतर्क रहने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन इसे सुधारों की प्रक्रिया को धीमा करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। कोटक ने वैश्विक आर्थिक माहौल को तेजी से बदलता हुआ बताते हुए कहा कि भारत को विकसित अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए आगे की रणनीति तैयार करनी होगी। उन्होंने आत्मसंतुष्टि से बचने और बदलती परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने की बात कही।
कोटक ने चीन के बड़े व्यापार अधिशेष का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं और दुनिया की आर्थिक शक्ति का संतुलन भी बदल रहा है। उन्होंने तकनीकी बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि सरकारों और निजी कंपनियों के बीच आर्थिक शक्ति का संतुलन भी प्रभावित हो रहा है। उनका मानना है कि तकनीक और निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका के बीच सरकारों को अपनी नीतियों और वित्तीय व्यवस्था को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत होगी।
राजकोषीय अनुशासन के मुद्दे पर भी कोटक ने सख्ती की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि राज्यों की विभिन्न वित्तीय जरूरतों और दबावों के बावजूद देश को अपने वित्तीय प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। उन्होंने 7 प्रतिशत से अधिक के राजकोषीय घाटे की स्थिति का उल्लेख करते हुए वित्तीय अनुशासन मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इसके साथ ही कोटक ने भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ते वित्तीयकरण को लेकर भी सावधानी बरतने की बात कही। उन्होंने कहा कि बाजार आधारित वित्तपोषण पर बढ़ती निर्भरता के कारण अर्थव्यवस्था के अत्यधिक वित्तीयकरण का जोखिम पैदा हो सकता है। उनके अनुसार भारत को अपने वित्तपोषण मॉडल पर भी विचार करना चाहिए और उन वस्तुओं तथा सेवाओं की क्षमता बढ़ानी चाहिए, जिन्हें वैश्विक बाजार भारत से खरीदना चाहता है।
कोटक ने मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को सुधारों की गति बढ़ाने के अवसर के तौर पर देखने की बात कही। उन्होंने ‘Never waste a crisis’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को संकट से मिलने वाले अवसरों का उपयोग करते हुए तेजी से जरूरी बदलाव करने चाहिए। उन्होंने राज्यों के स्तर पर भी सुधारों को आगे बढ़ाने और केंद्र तथा राज्यों के बीच बेहतर समन्वय के साथ विकास रणनीति तैयार करने पर जोर दिया।