UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्थाओं की जगह एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। बीजेपी लंबे समय से समान नागरिक संहिता को अपने प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक मुद्दों में शामिल करती रही है। अमित शाह के ताजा बयान के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
फिलहाल उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य है जहां UCC पूरी तरह लागू हो चुका है। उत्तराखंड में जनवरी 2025 से कानून प्रभावी है। वहीं गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में UCC को लेकर कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार, इन राज्यों के अलावा महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में भी UCC को लेकर अलग-अलग स्तर पर तैयारी या ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया की खबरें सामने आई हैं।
हालांकि NDA के भीतर UCC को लेकर पूरी तरह एकमत स्थिति नजर नहीं आ रही है। बिहार में जनता दल यूनाइटेड ने राज्य में UCC लागू करने को लेकर विरोध या सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। वहीं तेलुगू देशम पार्टी ने इस मुद्दे पर चर्चा के बाद निर्णय लेने की बात कही है। शिवसेना के शिंदे गुट और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा जैसे कुछ सहयोगी दलों ने समर्थन का संकेत दिया है, जबकि कुछ अन्य सहयोगी व्यापक विचार-विमर्श की मांग कर रहे हैं। इससे साफ है कि 21 राज्यों में UCC लागू करने के लक्ष्य के सामने राजनीतिक सहमति एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
UCC को लेकर विपक्ष की ओर से भी लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर सकती है, खासकर उन राज्यों में जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। दूसरी ओर बीजेपी UCC को समान नागरिक अधिकार, कानूनी एकरूपता और सामाजिक सुधार से जोड़कर पेश करती रही है। इस तरह UCC पर राजनीतिक और वैचारिक मतभेद आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।
2027 से 2029 के बीच कई राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और 2029 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में 21 NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि इसे सीधे चुनावी रणनीति कहना अभी राजनीतिक विश्लेषण का विषय है। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्यों में कानून किस रूप में तैयार होता है, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय कितना रहता है और NDA के सहयोगी दल किस हद तक सहमत होते हैं।
कानूनी स्तर पर भी राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े कई विषय संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं, जिसके कारण केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। इसी वजह से बीजेपी सरकारें राज्यवार UCC लागू करने के रास्ते पर आगे बढ़ रही हैं।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या 2029 से पहले UCC देश की राजनीति का प्रमुख चुनावी मुद्दा बनेगा। अमित शाह की घोषणा ने इस संभावना को जरूर बढ़ा दिया है। आने वाले समय में नए राज्यों में कानून की प्रक्रिया, अदालतों की भूमिका और NDA के भीतर सहमति यह तय करेगी कि 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य कितनी तेजी से आगे बढ़ता है।